श्री कृष्ण का आवाहन | Shri Krishn Ka Aavahan

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Shri Krishn Ka Aavahan by राजेन्द्र बिहारीलाल - Rajendra Biharilal

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about राजेन्द्र बिहारीलाल - Rajendra Biharilal

Add Infomation AboutRajendra Biharilal

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
पूजञाधम और सेवाधर्म श्शु मध्यससे व्यक्ति सब कुछ प्राप्त करता है और सदाचार ही विश्वका सार है |” तुल्तीदासजीने कहा है--- पर हित सरिस धर्म नहीं भाई | पर पीडा सम नहिं अधमाई ॥ पर हित बस जिन्हके मन साही । तिन्ह कहुँ जग दुरूभ कछु नाही॥ निर्नेय. सकल पुरान बेद कर। कहेडें तात जानहिं कोबिद नर ॥ मानवके विकासके लिये सेवा और पूजा दोनो आवश्यक हैं; लेकिन दोनोकों एक-दूसरेका नाशक नहीं बल्कि प्रक्क और सह्दयोगी होना चाहिये । आध्यात्मिकताका आधार और जीवनका पोषक द्वोनेके कारण इन दोनोमेंसे सेवा अ्रमुख है। यह बात चाद्दे कुछ विचित्र लगे, पर सच तो यह है कि ईश्वरके निबंल, अपूण और दीन-रूपो-जैसे पश्चु-पक्षी, मनुष्य, पवत, सर्तिा और जंगल, घर, पाठशाला और कारखानाकी आराधना खगमें बैठे सवेशक्तिमान, सम्पूण और अविनाशी ईश्वरकी आराधनासे श्रे्ठ है | देशभक्ति सर्वोच्च धर्म है भगवानके प्रति निष्ठा तमी छो सकती है जब मनुष्यके प्रति स्नेह हो | दूसरे शब्दोंमें देश-प्रेम सर्वोच्च धम है । बहुतसे आधुनिक संतोंके मनमें यह भावना प्रचुर मात्रामें रही है । खामी रामतीथ ने कहा है--- “जेसे एक शैव शिवक्की, बेंष्णव विष्णुकी, बौद्ध बुद्धकी+ ईसाई ईशाकी, सुसछ्मान मोहम्मदकी आराधना करता है, वैसे ही




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now