श्री कृष्ण का आवाहन | Shri Krishn Ka Aavahan

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
7 MB
कुल पष्ठ :
254
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)पूजञाधम और सेवाधर्म श्शु
मध्यससे व्यक्ति सब कुछ प्राप्त करता है और सदाचार ही
विश्वका सार है |”
तुल्तीदासजीने कहा है---
पर हित सरिस धर्म नहीं भाई | पर पीडा सम नहिं अधमाई ॥
पर हित बस जिन्हके मन साही । तिन्ह कहुँ जग दुरूभ कछु नाही॥
निर्नेय. सकल पुरान बेद कर। कहेडें तात जानहिं कोबिद नर ॥
मानवके विकासके लिये सेवा और पूजा दोनो आवश्यक
हैं; लेकिन दोनोकों एक-दूसरेका नाशक नहीं बल्कि प्रक्क और
सह्दयोगी होना चाहिये । आध्यात्मिकताका आधार और जीवनका
पोषक द्वोनेके कारण इन दोनोमेंसे सेवा अ्रमुख है। यह बात
चाद्दे कुछ विचित्र लगे, पर सच तो यह है कि ईश्वरके निबंल,
अपूण और दीन-रूपो-जैसे पश्चु-पक्षी, मनुष्य, पवत, सर्तिा और
जंगल, घर, पाठशाला और कारखानाकी आराधना खगमें बैठे
सवेशक्तिमान, सम्पूण और अविनाशी ईश्वरकी आराधनासे
श्रे्ठ है |
देशभक्ति सर्वोच्च धर्म है
भगवानके प्रति निष्ठा तमी छो सकती है जब मनुष्यके प्रति
स्नेह हो | दूसरे शब्दोंमें देश-प्रेम सर्वोच्च धम है । बहुतसे
आधुनिक संतोंके मनमें यह भावना प्रचुर मात्रामें रही है । खामी
रामतीथ ने कहा है---
“जेसे एक शैव शिवक्की, बेंष्णव विष्णुकी, बौद्ध बुद्धकी+
ईसाई ईशाकी, सुसछ्मान मोहम्मदकी आराधना करता है, वैसे ही
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