प्रताप रासो | Pratap Raso

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सम्पादकीय प्रस्तावना [ १५ गति पाने पर जवाहरसिंह गद्दी पर बैठे ।'* जवाहरसिंह ने दिल्ली फतह को और अपने पिता की मृत्यु का बदला लिया। राजनीति में एक नया मोड आया । जोधपुर (मरुघर) के राठोड राजा विजयसिंह ने जवाहरसिह को एक पत्र लिखा कि हम दोनो पुष्कर मिले और आश्रामेरपति को नीचा दिखावे।* दोनो का मिलना निश्चित हो गया। प्रतापर्सिहजी से कोई परदा तो था ही नही, उन्हे सब-कुछ मालुम हो गया और वे भरतपुर का साथ छोडकर आमेर के लिए रवाना हो गए। और कहते गए-'हरवल मो हथ देषियो' । इधर जवाहरसिह पुष्कर को रवाना हुए, और उघर प्रतापसिह श्रामेर को। जब पुष्कर मे ब्॒जराज जवाहरसिंह का मरुघराधीश विजयर्सिह से मिलन हुआ, तभी राव प्रतापसिह आ्रमेरपति की सेवा मे पुन' उपस्थित हो गए ।* इस प्रभाव की भी कोई घटना इतिहास के प्रतिकूल नही पडती । तृतीय प्रभाव : कवि ने इस प्रभाव का नामकरण “मावड़ा जुध वर्णन! किया है ।* इस प्रभाव के ग्रन्तर्गत मावडा के इतिहास-प्रसिद्ध युद्ध का वर्णन प्राप्त होता है। प्रतापर्सिह के आमेर लौटने पर आमेरपति प्रसन्न हुए*॑ और जवाहरसिंह से मिलने की तेयारी करने लगे। पुष्कर मे विजयर्सिह और जवाहरसिंह दोनो मिले तथा गुप्त मन्त्रणा की । उन्हे इस बात का भी पता लग गया कि आमेर मे युद्ध की तैयारी हो रही है और लौठते समय जवाहरसिंह पर हमला होगा । जब जवाहरसिंह लोटे, तो काफी दूर तक विजयसिंह उन्हे पहुँचाने ग्राए। जब निर्दिष्ट स्थान निकल गया, तो विजयसिह तो लौट गए, किन्तु अपनी १. सुजा गये सुरलोक सक्ति, चढे सार रण घार। बठे ते ब्रजराज के, तिलक तेज जोॉंहार ॥ (जवाहरसिह) २ पषत 'भेजे राठोड मोड मुरधर सजोग लिषि। दिसा तीन बस कीन घरा श्रामरि चत्र दषि॥ श्रान सक तजि सक है सुनि लीने सोरिय।1 तुम सामिल हम होय चले जित तित यक डोरिय 0 बिजराज (विजर्याप्तह) लिपी ब्रजराज को (जवाहररासह) षत बचत फीजो चलन । दीपदान (दिवाली) ञआा देषियो हम तुम पहुकर (पुष्कर) सिलन ॥ ३. इत चलिये पातिल प्रबल, जब चलिये जौहार वति। पहोकर जोंहार वीजराज मिलि, मिलि पातिल झ्रामरपति ॥ “इतति परताप रासो जाचीग जीवण कृत मावडा जुध वर्रन त्रतिय प्रभाव ॥शव ” ४. सिलि पातलि श्रासंरपति, भाघव नृपति सुनाम। बधु जानि झासन दिये, लिये दाहिनी ठाँम ॥




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