दिवाकर - रश्मियां | Diwakar - Rashmiyan

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Diwakar - Rashmiyan by अशोक मुनि - Ashok Muni

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भाघना ] . [ १७ ] नही खाने देता , दूसरा आदमी द्वेषभाव से, किसी को भूखा रख कर मार डालने के विचार से किसी की अन्न नही खामे देता 1 मोटे तौर पर दोनों का काम समान्र मालूम होता है ! पर दोनो अन्न खबने से सेकने वालों की भावना में बडा अन्तर है | एक जीवित रखने की भावना से रोकता है और दूसरा मार डालसे की भावना से रोकता है। जब दोनो की भावषनाएँ बिलकुल भिन्न-घिन्न है-एक दूससे से एकदम विपरीत है तो क्या दोनों को समाच फल की प्राप्ति होगी ” चही, ऐसा कंदापि नहीं हो सकता । प्रकृति के राज्य मे ऐसा अधेर नही है। एजिसकी जेसी भावना होती है इसको वैसा ही फल प्राप्त होता हैं । मृनिजन कल्याण-भावना से प्रेरित होकर, षाप कर्मों के त्याग का उपदेश्न देते है श्रत्तएव उन्हे अन्तराय कर्म का चन्द्र नही होता; वरन उपदेश देने से उनके पूर्वंचद्ध कर्मो की विर्जश होती है 1 ( ३ ) भावना के भेद से एक सरीखे काये के फल में भरे महान श्रन्तर पड़ जाता है । अतएवं सच्चा ससझंदार और पंडित वही है जो पापो थे डरकर अपनी भाववा की पवित्र और पुण्णममय रखता है । अन्तःकरण में कंषाय को जागृत नही डोने देता । कदाचित्‌ कोई ससारिक फाये करना पड़ता है हो भी यतत्रर रख कर अधिक पाप से बचने का प्रयत्व करवा है ।




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