सामाजिक नैतिक एवं बौद्धिक क्रान्ति कैसे | Samajik Naitik Avam Bauddhik Kranti Kaise
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
21 MB
कुल पष्ठ :
446
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)व्यवस्था में वे न होते जिन्हें अपनी रोटी दूसरों के साथ
खाना मंजूर भहीं। जिन्हें पूरी रोटी सिर्फ अपने लिए
चाहिए, बल्कि बस चले तो वे औरों कौ भी रोटियों
छीनकर बेच डालें और मिले धन से घूँटभर शराब पीने में
चैन महसूस करे.। साम्यवाद व्यक्ति कौ मौलिकता पर
कुठाराघात करने वाला सिद्ध न होता। विनिमय और
अर्जन की प्रणाली इतनी दुर्बल कैसे होती? ५
वास्तविकता कुछ ऐसी ही है। क्रान्ति की संरचना
और प्रक्रिया पर गौर करने पर स्पष्ट होता है कि इसका
आरम्भ हमेशा कुछ विचारशील, साहसी, परम्पराओं की
तुलना में विवेक को महत्व देने वाले व्यक्तियों के द्वाय
होता है। आर्थिक ढाँचा या तो तटस्थ रहता है अथवा
किन्हीं अंशों में सहयोगी अथवा विरोधी। राजसत्ता हमेशा
विरोधी पाले में खड़ी मिलती है। क्रान्तिकारी सर्वहित में
सर्वस्व दे डालने की मौलिक विशेषता के कारण
व्यक्तित्ववान होते हैं। अपने इस गुण व अदम्य साहस से
वह व्यवस्था बदल डालते हैं। प्रकाश में आती है
क्रान्तिकारी सरकार। क्रान्तियाँ क्षेत्रीय हैं या राष्ट्रीय, भारत,
फ्रांस का उदाहरण लें अथवा मिजोरम-आसाम का।
नेपाल, इटली, अमेरिका कोई भी क्यों न हो । हर कहीं
अपने समय में क्रान्तिकारी सरकारें आयी हैं। बस यहीं से
क्रान्ति रुकी और गड़बड़ियाँ पनर्पी। रशियन विचारक प्रिंस
क्रोपाटकिन ने “रिवोल्यूशनरी गवर्नमेण्ट” नामक निबन्ध में
इसका सुन्दर विवेचन किया है। उनके अनुसार ऐसी स्थिति
में क्रान्तिधर्मी-क्रान्तिविरोधी का चोला ओड़ लेते हैं।
सामयिक निदान हो जाने के कारण कुछ दिन अमन चैन
लेगता है। जाग्रत जन फिर गाढ़ी नींद के खर्यटों में
जाता है। पर थोड़े ही दिन बाद पोल खुल जाती है।
व्यवस्था के ढाँचे, आर्थिक रूढ़ियाँ आपस का विद्वेष, कड़ी
सामाजिकता, अनगढ़ जनसमुदाय सब मिलकर ऐसा भोंडा
प्रदर्शन करने लगते हैं कि विश्वास नहीं होता कि यहाँ
'कभी क्रान्ति हुई थी।
इसका एकमेव कारण है व्यक्ति और समाज की
संरचना और अन्तसंम्बन्धों को बिसार देना । जीवन का
विकास मनो-सामाजिक होता है। क्रान्ति क्यों नहीं ऐसी
होनी चाहिए?'व्यक्ति ढले नहीं, समाज सुधरा नहीं ऐसी
दशा में उलट-फेर कितने दिन काम देगी। स्थाई समाधान
एक ही है व्यक्ति बदले, समाज सुधरे। आवश्यकता मनो-
सामाजिक क्रान्ति की है। होता यह कि व्यवस्था को
बदलने वाले क्रान्ति दल के दो भाग होते हैं। एक नंयी
व्यवस्था में प्राण भरता, दूसरा व्यक्ति गढ़ता है। समाज की
प्रथा, परम्परा व कुरीतियाँ सुधारता है। मात्र सामाजिक
क्रान्ति से काम चलने वाला नहीं। जमाने को भारी तादाद
में विवेकानन्द, गाँधी मैजिनी चाहिए; जब तक इस व्यक्ति
निर्माण की फैक्ट्री में ताला लगा हुआ है तब तक क्रान्ति
की पूर्णता सम्भव नहीं। व्यक्ति अच्छे होंगे, हर बिगड़े ढाँचे
को बना देंगे। यदि ये स्वार्थ लोलुप हुए तो बने ढाँचे को
भी जर्जर हो चकनावूर होना पड़ेगा।
सामाजिक, नैतिक एवं बौद्धिक क्रान्ति कैसे? १.१ ३
आज की दशा में जर्जरित ढाँचों में पिस रहे मानवी
जीवन को देखने पर यही लगता है कि कर कर
आदमी वहीं बल्कि उसके भी बदतर हालत में आ पहुँचा
है जहाँ से उसने अपनी यात्रा शुरू की धी। अब उसे पुनः
आवश्यकता पड़ गई है कि नयी व्यवस्था का सृजन हो।
परस्पर के सम्बन्ध नए सिरे से विकसित हों अर्थात् समाज
नीति की नयी स्मृति बने। विनिमय प्रणाली ऐसी हो जो हर
किसी की सामान्य जरूरतें प कर सके। मानवी चेतना के
अवरोहण, बहिरंग जीवन को परिष्कृत करने वाली ऐसी
प्रक्रिया विकसित हो अन्धविश्वास जिसके निकट न
'फटके।
इस आ पड़ी जरूरत को कौन पूरा करेगा? कहाँ है ये
सब विशेषताएं? इसके लिए क्रान्ति के उस नये आयाम को
ढूँढ़ना पड़ेगा जो विगत की भूलों से मुक्त हो, जिसमें व्यक्ति
के मनो-सामाजिक नवसृजन की अपूर्व क्षमता हो। क्रान्ति
का वही नया आयाम विचार-क्रान्ति है। इस नये आयाम
द्वारा सम्पन्न हो रही महाक्रान्ति ने अपना केन्द्र बनाया है,
व्यक्ति को, उसकी परिधि है समाज-व्यक्ति की
अन्तर्शक्तियों को उजागर करे, समाज की प्रत्येक प्रणाली
को नया रूप देने के लिए कटिबद्ध हो यह। विश्व के
समस्त मानव समुदाय के क्षितिज पर क्रियाशील प्रथम
अहिंसक महाक्रान्ति होगी। हिंसा, विद्वेष, मानवीय
दुर्बलताओं को जो उखाड़ फेंकने के लिए तत्पर हो उस
प्रक्रिया में इनका स्थान कहाँ ?
इतने घर भी इसकी शक्ति ने समूचे विश्व को
चकित कर रखा है। विचारों का जबर्दस्त या
कुछ नहीं कर रहा इन दिनों। १९१७ की बोल
क्रान्ति गायब, हिटलर का उत्थान और पतन दोनों
समाप्त । हेनरी ट्रमैन से रोनाल्ड रीगन तक चलने वाला
शीत युद्ध पिघलेकर बह गया। अटलांटिक सन्धि का
रक्षातन्त्र रद्द, जर्मनी का बँटवारा समाप्त। धर्म और
विज्ञान के कदम एक दूसरे से मिलने के लिए बढ़े।
तनिक गहरे उतरें तो पता! चलेगा कि विचार-क्रान्ति को
वीणा ने सदभाव, सहनशीलता, सदाशंयता की नयी
रागिनियाँ बजाईं हैं। हो भी क्यों भ ? तलवार से हम
मनुष्य को पराजित कर सकते हैं, जीत नहीं सकते।
मनुष्य को जीतना, उसके हृदय पर अधिकार पाना है
और हृदय की राह समर भूमि की लाल कीच नहीं,
सहिष्णुता का शीतल प्रदेश है, उदारता का उज्ण्चल
क्षीर समुद्र है। 5
विचारों की क्रान्ति यही राह प्रशस्त कर रही है,
डूटे दिलों रे जोड़ रही है और पुराने घावों को
सहलाकर उन्हें भरती जा रही है। “वारसा सन्धि
संगठन” “उत्तर अटलांटिक संगठन” जिन्होंने दो दुनिया
हो चसः रखी थीं इस तरह एक दूसरे को छाती से
चिपयाने के लिए आतुर हो उठेंगे, किसने सौचा था?
पश्चिम एशिया के घोर शत्रु ईरान और इराक का भी
निकट आने के लिए सोचने लगना, बलिन की दीवार
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