समयसरः | Samaysar

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Samaysar by श्री कुन्दकुन्दाचार्य - Shri Kundakundachary

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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9 रायचन्द्रजन्शालत्षमालायाम्‌ । [ प्रस्तावनाशासत्र रचा । उसकी टीका समुझरण नामा सुनिने बारह हजार अमाण रची। इस तरह आचार्योंकी परंपरासे कुंदकुंदमनि उन सिद्धांतोंके ज्ञाता हुये । ऐसें इस द्वितीय पिद्धांती उपत्ति है ॥ इसमें ज्ञानको प्रधानकर शुद्धद्रव्याथिकतयसे कथन है । अध्यात्ममाषाकर आत्माका ही अधिकार है। इसको शुद्धनिश्चय तथा प्रमार्थ कहते है। इसमें पर्यायार्थिकनयको गौणकर व्यवहार कह असल्वार्थ कद्दा है। सो जबतक पर्याय बुद्धि रहे तबतक इस जीवके संसार है । और जब शुद्धनयका उपदेश पाकर द्रव्यबुद्धि हो, अपने आत्माकों अनादि अनंत एक सब परद्रव्य परभावोंके निमित्तसे हुए अपने भावोंसे भिन्न जाने, अपने शुद्धखरूपका अनुभवकर शुद्धोपयोगमें लीन हो तब कमेका अभाव करके निर्वाणको पाता है। इस प्रकार इस ह्वितीय शुद्धनयके उपदेशके पंचासि- काय, प्रवचनसार, समयसार, परमात्मप्रकाश आदि शात््र प्रवर्ते हें। उनमें यह समय ग्राभूत ( सार ) नामा शास्त्र है, वह श्रीकुंदकुंदाचार्यक्रत ग्राकृतमाषामय गाथावद्ध है। उसकी आत्मस्यातिनामा संस्कृतटीका अमृतचंद्र आचार्यने की है, सो काल दोषसे जीवोंकी बुद्धि मंद होती जाती है उसके निमित्तसे प्राकृत संस्कृतके अभ्यास कर- नेवाले विरले रह गये हैं । और गुरुओंकी परंपराका उपदेश भी विरला होगया, इस लिये मेंने अपनी बुद्धिके अनुसार ग्रंथोँका अभ्यासकर इस ग्रंथकी देशभाषामय वच- निका करनेका प्रारंभ किया है। जो भव्यजीव बाचेंगे पढेंगे सुनेंगे उसका ताले धारेंगे उनके मिथ्यात्वका अभाव होजायगा, सम्यग्दशैनकी प्राप्ति होगी । ऐसा अभि- प्राय है कुछ पंडिताईका तथा मानलोभ आदिका अभिग्नाय नहीं है । इसमें कही बुद्धि- की मंदतासे तथा प्रमादसे हीनाधिक अर्थ लिखूं तो बुद्धिके धारक्क जनों! मूलग्रंथ देख शुद्ध कर वांचना, हाल नहीं करना, क्‍योंकि सत्पुरुषोंका खभाव गुणग्रहण करनेका ही है। यह मेरी परोक्ष प्रार्थना है ॥यहां कोई कहे कि “इस समयसारग्रंथकी तुम वचनिका करते हो, यह अव्यात्म ग्रंथ है इसमें शुद्धनयका कथन है, अशुद्धनय व्यवहास्तय है उसको गौणकर असलार्थ कहा है। वहांपर व्यवहार चारित्रको और उसके फल पुण्यबंधको अल्येत निषेध किया है । मुनित्रत भी पाले उसके भी मोक्षमाग नहीं है ऐसा कहा है। सो ऐसे ग्रंथ तो ग्राकृत संस्कृत ही चाहिये । इनकी वचनिका होनेपर सभी आणी वांचेगे । तब व्यवहार चारित्रकों दिष्ययोजन जानेंगे, अरुचि आनेसे अंगीकार नहीं करेंगे तथा पहले कुछ अंगीकार किया है उससे भी अष्ट होके खच्छंद हुए अ्मादी हो जायंगे । अद्धानका विपर्यय होगा यह बड़ा दोष जायेगा । यह अंथ तो-जो पहले मुनि हुए हों, छढ चाजिज पातते हों, शुद्ध आत्म- खरूपके सन्मुख न हों और व्यवहारमात्रसे ही सिद्धि होनेका आशय हो उनको शुद्धा त्माके ०० करनेके टिये है, उन्हीके सुननेका है । इसलिये देशभाषामय वचनिका करना ठीक नहीं है” ! उसका उत्तर कहते हैं--यह वात तो सच है कि इसमें शुद्धनयका ही




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