यन्त्रचिन्तामणि | Yantra Chintamani

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रस्तावना । -«-हूँरजोनफनन- प्रिय महाजुभावों ! यह॑ वही पंथ है कि, जिसके छिये आप चिरकालसे उत्कोठित हो रहे थे । संसारमें जितने ग्रंथ दिखाई देते हैं उनमें यह मंत्रशाल् बडा अलौकिक है, कारण इससे मलुष्यकी आकांक्षा वहुतही शीघ्र पृ होजाती है, फिर यह शास्त्र वेदोंसे मिकझा है इसलिये इसकी सत्यतापर तो किंविस्मान्रभी सन्‍्देद् नहीं किया जा सफता बरन इसके वाक्य ब्रद्यवाक्य समझे जाते हैं। मंत्रशासख्के भन्तर्गतद्दी यंत्र ओर तंन्रशास्र भी हैं । प्राचीन कालमें हमारे महान्‌ भाषाये ऋति मानियोने इसी मंत्र ( संत्र- तंत्र ) भाक्षोके द्वारा अपना;जीवन सुखमय बनाया था | इन दिलों मंत्र- शासत्रका प्रचार बहुतु फम होने तथा इस विपयपर अच्छे सरल ग्रंथ न रहने एवं जनताकी भश्रद्धा बढने आदिसे यह शास्त्र प्रायः छ्तसा दोरहा है, किन्तु असम मी इस विपयंका जो कुछ प्रचार शोष रद्दगया है उसपर यदि पाठक भलीभांति ध्यान देकर अध्ययन तथा सनन फरें तो इस मंनव्राक्यसे अह्प “५ काठमें दी उतकी बह चिए अमिलापा पूरी हो सकती दै कि जो मरणपर्यन्त अन्य शासोंके पठन पाठनसे नहीं हो सकती ! इस फर्मभूमिमें सिद्धि भाप्त करानेस्े लिये अनेक अन्यान्य शा्ष हैं और मन्ज्रशासत्रमी । उसमें जदाँ और और शात्र दूध अथवा दद्दीरे सदक्ष हैं वहां मेत्र शासत्र मकंखनके सद्श होरहा है | मक्खनमें दूध वा दृद्दात्ति अवश्यहरि बहुत अधिक स्वाद और अधिकशाक्ति होतो है| यह इससेभी सिद्ध है कि खायपदायमें श्रीकृष्ण भगवान्‌ माखनकों ही अछ समझते थे । भव; शाघदी मलुष्योंके अभिलवपित फछ श्राप्त होनेके लिये मंत्रशाख़से धढकर कोई दूसरा उपयोगी शास्त्र नहीं है ( मंत्रशाखके अन्तर्गतददी यह “यैन्नचिन्तामाणि” है फि जिसमें अनेक प्रकारके सिद्धिदायक मंत्र और यंत्र भरेहये हैं । परमपूज्य महात्मा भंगाधरजाके पुत्र ६४ कछाओंमे चतुर श्रीगगेशजकि परमभक्त महायह॑स्थी परेंस घुद्धिमान दामोदरजी उ्पन्त हुये । उन्दोंने जय >शिवोक्त-सबोक्त देव्युक्त प्रभृति भक्कों शास्षोको विसत्तारपुर्कक देखरुर 7




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