मलयसुन्दरी रास | Malayasundari Ras

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Book Image : मलयसुन्दरी रास  - Malayasundari Ras
[adinserter block="2"]

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about मणिप्रभसागर जी - Maniprabhsagar Ji

Add Infomation AboutManiprabhsagar Ji

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
विद्या सिद्ध पुरुष को सत्कृत, सम्मानित कर किया विदा | महापुरुष की महिमा पर महि, मन से होती रही फिदा ॥ वीर घवल के पास कार्यवश, नृप ने भेजा मन्त्रीगण । राजकुमार पूछता नृप से, कर आाऊँ में देशाटन ॥ ज्ञान बढ़े सम्मान बढ़े निज, कुलाभिमान सुख बढ़े चढ़े । देशाटन जो नहीं करे नर, वे विद्यायें व्यर्थ पढ़े ॥ देश-देश के वेश, रीतियों, भाषाश्रों का ज्ञान मिले। घर प्र बेठे बेठे किसको, राम-क्ृष्ण भगवान मिले ॥ पित्राज्ञा ले प्रतिनिधियों संग, चले वहां से राजकुमार । सहयोगी का वेष बनाकर, पहुँचे वीर धवल दरबार ॥। वीर धवल राजा की भारी, सभा शान से जुडी सकल ।६ ॥।द्वारपाल आकर के बोला, शीश भूकाकर दिखा अकल ॥| १०॥पृथ्वी स्थान पुरी से श्राए, सचिव और उनके साथी ।नृप के, दर्शन करना चाहते, आज्ञा यों मांगी जाती ॥ ११॥लिवा लाइये उनको श्रन्दर, द्वारपाल जा ले आया।रख उपहार सभी ने अपना, शीश भूकाया सुख पाया ॥ १२॥।प्राभूत कर स्वीकार भूप ने, बिठलाया करके सत्कार।दरबारों का होता ही है, अलग-शभ्रलग अ्रपना व्यवहार ॥| १३॥नूप ने पूछा सूरपाल नृप, सकुशल हैं परिवार समेत ।परम हितेषी मित्र हमारे, किसी तरह का कहीं न द्वात ॥ १४॥[45




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now