मणि - मंथन | Mani - Manthan

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Book Image : मणि - मंथन  - Mani - Manthan
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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उपोटुघातप्रवयन परिवर्तनं का सवक साधन है । वीतराग वाणी के प्रति समर्पित आचारनिष्ठ ज्ञानीपुरुष के स्वय स्फूर्ठ चिन्तन से निसृत यह वह अमृत हैं जो श्रोता को अजर-अमर बना देता है । यह वह सजीवनी है जो मोह-मूरच्छिति आत्मा को सजग बनाती है । यह वह सूर्योदय है जो सुपुप्त चेतना के जागरण का शखनाद करता है । यह वह कला है जो दिगु-भ्रमित मानद को सही दिशादोप कर श्रद्धा जौ सकस पूर्वक उस ओर कदम वढाने का अप्रतिम साहस प्रदान करती है । किसी चिन्तक ने ठीक ही कहा है- वक्ता श्त सहद्रेषुः अर्थात वक्ता लाखों मै एक मिरता है ।सामान्यत सभी कलाएँ प्रयास साध्य होती है । प्रवचन देना धी एक कला है अते वह भी प्रयास साध्य है किन्तु जीवन में सर्वागीण विकास उन्हीं कछाओं का होता हैं जिनके बीज सहज-संस्कार के रूप में होते हैं । प्रस्तुत सग्रह एक ऐसे ही प्रवयनकार की अनमोल प्रसादी है जिनमे वक्तृत्व के चीज सहज संस्कार के रूप में उपकब्ध होते हैं । ये प्रवचनकार हैं-प. पू प्रज्ञापुरुष आचार्यदेव श्री जिनकांतिसागर सूरीस्रजी मे सा के प्रधान ऐिप्य प. पू महाप्रत प्रसिद्धबकता गणित श्रो 'मणिप्रभतागर जी भ. सा । जो केवि साधक व मनस्वी चिन्तक हैं 1जीवन समस्याओं का पर है-ज्यों-ज्यों भौतिक साधन और सुविधाएँ बढती जाती हैं त्यॉ-त्यों मानव का 'भटकाव और तनाव बढ़ता जाता है । सुख शान्ति को पाने का बढ जितना अधिक प्रयास करता है उतनी ही अधिक वे उससे दूर होती जाती है। इसका मूल कारण है-अर्सपम.....बषिक सुखो की आसक्ति । जवं तक मन दिपयों में भटकता रहेगा इन्द्रियां विपयों की ओर दौडती रहेगी आत्मसपम की बात असमद है । विना आत्मसयष के उस सुख और शान्ति की उपलब्धि कल्पनामान्र है जिसके माद में मानव सब कुछ होते हुए भी निरन्तर रिक्तता का अनुभव करता है । असन्तोप और आतदृप्ति की आग में जलता रहता है ।इमं सवका समाधान है-शान्ति और सुख की सच्ची राह चींपने दाल महापुरुष का मार्गदर्शन | ुपुत्त चेतना को जगाने वाली साधक की सत्प्ेगगा । जीवन के छश्य का निर्पारण करने घांठी ज्ञास पुरुष की वापी ।प्रतत प्रवचन वास्तव मे मार्गदर्शन, प्रज्ञा जागरण ओर ल्य का निर्पारण के सवत प सफल प्रयोजक हैं जो हमारे अस्तित्व को पृथक ही नहीं करते अपितु उसे सर्वो्पारि महत्व देने को प्रेपिति करते हैं ।सापना के द्वारा स्वप को उपलब्ध करना यहीं जीवन का सर्वश्रेष्ठ उपलम्य और प्राप्य है।




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