अंतगड़दसा सूत्र | Antagad dasa Sutra

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Antagad dasa Sutra by घीसूलालजी पितलिया - Gheesulalji Pitlia

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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वर्ग १ अ. १ छ्‌ वर्ग में निम्त दस अध्ययनों का निरूपण किया है-प्रथम अध्ययन मे गौतम कुमार का वर्णन है, दूसरे मे समुद्र, तीसरे अध्ययन मे सागर का वर्णन है, चौथ अध्ययन मे गंभी रकुमार, पांचवे अध्ययन में स्तिमित कुमार का वर्णन है। छठे मे अचल, सातवें मे कम्पिल, आठवे में अक्षोभ, नववे मे प्रसेनजित, दसवे में विष्णकुमार का वर्णन है । श्री जंबू स्वामी ने श्री सुधर्मा स्वामी से पूछा- हे भगवन्‌ ! यदि भगवान्‌ महावीर स्वामी ने श्री अन्तकृतदशा के प्रथम वर्ग मे उ१रोक्‍त दस अध्ययन फरमाये है, तो प्रथम अध्ययन में भगवान्‌ ने क्या भाव फरमाये है ? ६ एवं खल्‌॒ जंब्‌ ! तेणं कालेणं तेणं समएणं बारवई णामं णयरी होत्था, दुबालस जोयणायासा णव जोयण- विच्छिण्णा धणवइ मइ-णिम्प्या चामीगरपागाराणाणा- सणि पंचवण्ण कविसीसग परिमंडियासुरमस्मा अलका- पुरी संकासा पमुइय-पदकीलिया पच्चक्खं देवलोगभूया पासाइया दरिसणिज्जा अभिरूवा पडिरूवा ॥ अर्थ-श्री सुधर्मा स्वामी ने फरमाया-हे जंवू ! बावीसवे तीर्थंकर भगवान्‌ अरहंत अरिष्टनेमि स्वामी के समय मे द्वारिका नगरी थी । उस द्वारिका की लम्बाई वारह योजन (अडतालीस कोस) थी, उसकी चोडाई नौ योजन (छत्तीस कोस ) थी । धनपति-वेश्रमण-कुबेर की बुद्धि से उसका निर्माण हुआ था। स्वर्ण मय प्राकार एवं मणिरत्न खचित पंचरंगे कंगरों से परिमंडित एवं सुरम्य द्वारिका नगरी अलकापुरी के सदृग




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