प्रतिमा पूजन | Pratima Poojan

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Pratima Poojan by श्री भंद्रकरविजय - Shri Bhandarkarvijay

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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रज़िनप्रतिमा, जिन समान ।! यह वचन हमे मृत्ति में परमात्मत्व की मऋतक बताता है । पूज्य पन्यासजी महाराज की वाणी “श्री भरिहन्तो के विम्वो/मूर्तियो मे जो प्रमाव है, वह माव-अरिहन्तों मे से आया हुभा मानना चाहिए ।' तीन प्रतिप्ठाओं द्वारा घडकता हुआझ्ना परमात्मशक्ति चैतन्य हमारे हृदय मे अनोखी शक्ति सचरित करा देता है । परमात्मा की समीपता, भश्रदुमुत शक्ति का सचरण करती है, तो परमात्मा का विरह, उसका भ्रदर्शन (दर्शन न होना) भववन में मठकाता है। परम अहंत्‌ श्री कुमारपाल ने कहा है-- ससाररूष समुद्र मे मटकते हुए भ्रनादि काल से-- में मानता हूँ कि प्राप फो मेरे दृष्टिपय में नहों भाएं। श्रयधा नरक फो भ्रस्तोम बेकना, है प्रभु, जो मैंने बडे दु स से मोगी, यह मेंने क्यो पाई होती हे विभु ? परमात्मा के दर्शन हम करें। ऐसे दर्शन, जो भश्रनादि काल के विरह दुस को मिटा दे। 'वाचक जस” की अनुमवरूपी टकारयुक्त वाणी बहती है, पाए सुस्र देस मुखचद्रमा, विरहव्यथा का दुख सारा मिटा दे ।! मह्षियो की भक्तिवाणी के साथ-साथ हम भी प्रमृत तत्त्व की खोज के लिए निकल पडें-वोज प्रारम्म कर दें । ( २३ )




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