अभिनव प्राकृत - व्याकरण | Abhinav Prakrit - Vyakaran

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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४ अभिनव प्राइत-व्याकरण तऊ द्वमारा विश्यास है इसे एक प्याकरण फे ध्ययन के उपराध्त आन्य व्याकरणों की ज्ञानकारी की अपेक्षा नहीं रहेगी। मध्यकाछीन कार्यभापाओं की प्रमुख प्रवृत्तियों के साथ 'आधुनिक लार्यभाषाओं वी उत्पत्ति के बीज सिद्ध।न्तों को भो जाना ज्ञा सकेगा। ( १० ) भापाविज्ञान के अनेऊ सिद्धान्त भी इस ध्याकरण में समाविष्ट हैं । स्वर- छोप, व्यश्जनछोप, स्वरागप्र, व्यश्जनागम, स्रर-व्यम्जन-दिपर्यय, समीकरण, विषमोकरण, घोषीकरण, अधोषपीकरण, भ्मिथुति, अपश्ुति और स्व॒स्मक्ति के नियम्त इसमें अन्तईत ह॥ूं। क्षत, भाषाविज्ञान के अध्ययनाधियों के छिप इस व्याकरण की उपयोगिता कम नहीं है । शाभार इस व्याफरण को एिखने की प्रेरणा श्री भाई गिनयर्कर जी, तारा पब्छिकेशन्स, घाराणसी एवं मित्रयर डा० राममोहनदास जी एम० ए०, पी-पएच० डी० जार से प्राप्त हुई दे। भाप दोनों के आप्रद् से यद्द कृति पृक वर्ष में लिखकर पूर्ण की गयी है, भत; मे उक्त दोनों भाइयों के प्रति हृदय से इतश्ता ज्ञापन करता हूँ। आदरणीय डा० एन, टाठिया, निर्देशक प्राकृत जैन विद्यापीझ, मुजफ्फरपुर ने विपयसम्बन्धी सुझाव दिये हैं, जिनके लिए उनरा आभारी हूँ। उदादरणानुक्तमणिकाः एवं प्रयोगसूची तैयार करने में प्रिय शिप्प श्री सरेस्क्रकुमार जैन ने अथक श्रम किया है, अतः उन्हें हृदय से आशीर्षांद देवा हूँ। भाई प्रो० राजारामजी तथा स्वामी हारिकानाथ शाशी, व्याकरण-पाछि-ओद्धदशनाचार्य, वाराणती से प्रूफसंशोधन में सहयोग प्राप्त द्वोता रदह्दा है, भत उनके प्रति भी क्षाभारी हूँ। उन समस्त स्नन्‍्थकारों का भी आभारी हूँ , जिनकी रचनाओं के अध्ययन से प्रस्तुत प्राशत घ्याकरण सम्बन्धी साममी प्रहण की गयी है । शूछों का रहना स्थाभातिक है, अतः चुटियों के छिप क्षमायाचना करता हूँ। 1एच० डो० जैन कालेज, पारा * | नेमिचन्द्र शाल्री (मगघ विश्वविद्यालय) श्रावण, वीर नि० सं० २४८६




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