महाभारत सौप्तिक पर्व | Mahabharat Sauptik Parv

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Mahabharat Sauptik Parv by राजाराम जी -Rajaram Ji

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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२२४ महामारत आअ० २ ( वृ० २-५ ) छूपाचार्य और अश्वत्थासा का खंचाव्‌ सूल-कृष ब्वाच-श्षत्त दे वयने सब यत्रदुक्त ला बिभो | माप तु बच किश्विच्छुणुप्वः्श पदाझुज ॥ ९ ॥ रामाव को- घाद भयाक्षाभादोडर्थाबीदाति घानव: । अवीक्षश्राधधात्री चस पीघे अबमते खिए। ॥ २ ॥ सोडय दर्योधनेनाथों छुब्धे जादीघे- दर्षादा । अएगदे सवारणों मूहस्वाद विचिन्तितः ॥ ३ ॥ हित- पु. :7यामख्यासाधुभि! सह । छार्यमाणोडकराद्वेरं पाण्ड- वैगेणवत्तर३ ! ० ५ अलुवर्दायने य्द से बय पापपूरुष | अरपान- प्यनयस्तस्पारपराप्लीडस दारुणो महादु॥ ५ ॥ अनेन तु घशचापे व्यप्नेनोपद/ ८५०५1 बुद्धिश्िन्दपते छिश्षिव स्वैश्नयों नाग हुध्यते 1 ६ ॥ शुल्ता तु मलुष्येण प्रष्टठव्या छुहदोलता। । दक्षारुण बु- डिविलयर्वच्र अियश्व॒ प्यात॥ ७ ४ ते *ई घृतगए् च भाम्यररी च समेस ह । वपपुच्छायहे सत्क 'दिंदुरं जे महासत्ति ॥ < ॥ पृष्ठारतु बदेयुर्वच्छुी दा समनन्तर् | सदरप्राणि। पुन कार्ये मितति मे लेछिकी घहि) ॥ ५ हे झथु-अपायाय बोढे--हे जत | जो २ दाद तुपंगे कही, चह सब इसने सुनी, अब तेरी वाद को थी ८६ गदावाहों छुनों ॥ १ ॥ लो शहुष्य रूम, ऋोछ, सए या छोश्र से अथों को पाना चाहवा है, और सपर्थ न हो के दूबरों का अपमान करता है, वह शीघ्र छक्ष्पी से अष्ट होता हैं ॥ २ ॥ सो यह कोती भदूर-, दकका दुयाधन में अपनी मूढता ने थे होवकन बाला कादे आर- स्त् किक है 8 ॥ हि घनादर कर, अध्तत्पुरुषों से मन्थणा क्के सोकते २ ३ अधिक शुण दारे 'पाण्डवों ३ दे बेस किया ॥ ४ ॥ हम भी जो इस पाप में उस के साथ रहे,




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