समय सार | Samay Saar

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Samay Saar  by श्री कुन्दकुन्दाचार्य - Shri Kundakundachary

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रकाशकीय धममं-प्रेमी बन्चुओ !' आज आपके कर कमलोंमें समयसार सप्तदशाजी टीकाका प्रकाशन सॉँपते हुए मुझे अतीव हर्ष है । अध्यात्म ग्रन्थोंमें प्रंघान ग्रस्य समयम्तार है जिसके रचयिता मूलसंघनायक परमपृज्य श्रीमर्कुन्दकुन्दा- चार्यदेव हैं जितका कि मंगल भगवान वीरो मंगल गौतमो गणी, मंगल कन्दकुन्दाद्यो जनधर्मस्ति मंगल से गौरव के साथ नाम लिया जाता है। समयसार पर तत्त्वज्ञानामृतपुरित भात्मख्याति टीका है जिसके रचयिता परमपृज्य श्ीमद- मृतचन्द्रमूरि हैं जो टीकाकारोंमें मूर्धन्य हैं जिनकी अद्भुत अनेक संस्कृत ग्रत्थोंकी रचनायें हूँ, जिनके प्रत्येक वचनों में तथ्यामृत भरा पड़ा है। मूल और संस्कृत टीका दौनोंपर सप्तदशाज्डी टीका है जिसके रचयिता अध्यात्मबोयी श्रीमत्सहजानन्द महाराज हैं। इस सप्तदशाड्री टीकाका निर्माण व प्रकाशन लगातार ही चलता रहा, प्रथम कुछ पृष्ठों में चतु्दशाज़ी टीका रची गई थी, पश्चात्‌ श्री सुमेरचन्द जी जैन १४ प्रेमपुरी मुजफ्फरनगर जो दर्शनके लिये सरधना आये थे उनके हाथ में एक छोटी प्राकृत पुस्तक देखकर महाराजश्री का भाव हुआ कि इसमें प्राकृत नामसंज्ञ, घातुपंश व॑ प्र।कृत पदविवरण ये ३ अंग और बढ़ा दिये जांयें सो इन तीन के बढ़नेपर सप्तदशाज़री टीका हो गई 1 जिन गाथाओं के ३ अंग घट गये वे भमिकाके अन्त मुद्रित हूँ व अगले प्रकाशन में सम्मिलित फर दिये जायेंगे । सदस्योंका आग्रह, अध्येताओंकी रुचि, साहित्यमें निष्पक्ष व आगमानुकल प्रतिपादत, उच्च उच्चतर ग्रन्यों का सुगम विवेचन, जश्ञानभण्डार महाराजश्री की समाजको अनुपम ज्ञान देन इत्यादि प्र रणाओंके कारण सहजानन्द साहित्य प्रकाशनकी सेवाका सौभाग्य मुझे सन्‌ १६५४ से प्राप्त होता चला आ रहा है। पूज्य श्री मुनिराजगण, त्यागिवर्ग, विद्वान, जिज्ञासु बन्धुओं के इस साहित्यके अध्ययनकी रुचि और अध्येताओंके हप॑सूचक वचनोंसे सुविदित हो रहा है कि महाराजमश्री के साहित्यसे भव्यात्माओंका कल्याण हो रहा-है। आत्मकल्याणार्थी अनेक महापुरुषोंने सहजानन्द साहित्य का अध्ययन मनन कर यह भी भाव व्यक्त किया है कि बाजके युगर्मे अध्यात्मयोगी ग्रुरुवर्य श्री सहजानन्द (मनोहर जी वर्णी) अद्वितोय ज्ञानभण्डार हैं। जिन पूज्य श्री मुनिराजों को, त्यागिवर्ग को, ब्रह्मचारियों को; श्रावक्रों को सहुजाननद महाराज से अध्ययन करने का अवसर मिला, उनके हर्षोदृगारों ने मुझे सहजाननद साहित्य प्रकाशनकी सेवाके लिये उत्साहित किया है | अनेक तत्त्वज्ञ अध्येताओंने बताया है कि (१) निष्पक्ष तत्त्वज्ञान, (२) शुद्धनयके विषयभूत सहज अखण्ड शाश्वत कारणसमयसाररूप चैतन्यस्वभावकी दष्टिके लक्ष्से प्रतिपादन, (३) वैराग्यपूरक बचत, (४) पर- मात्मा व सदयुरुओंके प्रति समयसारोम्मुखी भवितकी उमंग व (५) प्रयोगमार्ग इन पणथ्चरत्नोंसे पृरित होनेके कारण सहजानन्द सांहित्य परमोपकारी साहित्य है । व्यवहास्नयके अविरोधसे भध्यस्थ होकर शुद्धद्रव्यनिरूपक निश्चयनय को मुख्यतासे प्रतिपादक होनेसे इस सहजानन्द साहित्यमें कहीं भी रंचमात्र भी सन्मार्गसे स्खलित होनेका अवसर नहीं है, प्रत्युत आपंपरम्पराकी भांति सन्मार्गमें निःशंक निर्वाध बढ़ते चले जानेका व सहजात्मस्वरूपके भनुभवनका तथा अलौकिक सहज आनन्द पाते रहनेका सुभवितव्य प्राप्त होता है । श्री सहजानन्द महाराज (मनोहर जी वर्णी) ने गुरुवर्य आध्यात्मिक संत्त श्री गणेशप्रसाद जी वर्णी जी महाराजके तत्वावधान में ७॥॥ वर्षकी आयुरे जैन संस्कृत विद्यालय सागर में छठी कक्षामें प्रविप्ट होकर १० वर्ष तक अध्ययन फर सिद्धान्तशास्त्री, न्‍्यायणास्त्री, साहित्यक्षांसत्री, न्यायतीय परीक्षायें उत्तीर्ण कीं। आप वचपनसे ही विरवत स्वभावके एवं तीब्॒कुशाग्रवुद्धि वाले थे । भाप प्रतिदिनकका पाठ उसी दिव या समय न मिलने पर दूसरे दिन सुबह अपने सहपादियोंकोी पढ़ाते थे। इससे सिद्ध है कि आपके ज्ञान भौर मौलिक वैराग्यकी देनमें पुवंभवका सुसेस्कार भी कारण है। आपके द्वारा आध्यात्मिक सँद्धान्तिक दाशंतिक निवन्ध प्रवचन छोटे बड़े सब ५०० ग्रन्थों का निर्माण हुआ जिसमें ३०० प्रन्य प्रकाशित हो गये, २०० ग्रन्थ प्रकाशित होनेके लिये रखे हैं । इनके अतिरिवत जिनकी रचना प्रारम्भ की व जिनसे सम्बन्धित ग्रन्थ रचे जाने हैँ वे ४५ और हैं। आपके द्वारा इतने दिये गये विशाल ये सारभूृत ज्ञानसाधन से समाज उऋण नहीं हो सकतीं | पर्तमान में जो ग्रन्य प्रकाशित हैँ उनकी पुस्तकों का विवरण इस्र प्रकार है-- [ | .॥




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