अथर्ववेद भाष्य | Atharvaved Bhashya

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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मू० ६ [५२२] रफ्ानविंश काएडम ॥ ९४ ॥ (झईए ): ( अतिप्ठत्‌:) ठदरा.है ॥ १ ॥ 18 «0 हि को सावाब-जिस परमात्मा में. सहस्नों अर्थात्‌ असंण्य भुताओ्ों, असंदयपः | , नेज्ों भौर असछंठप पैसों का साप्रथ्प है:भ्र्थात्‌ जो अपनो. सर्वव्यपकता-से सब ईन्द्रियों.का काम करके झनेक रचना आदि कर्म, करता. है | घह जगदीश्वर ,भूमि से लेशर सकल ब्रह्माण्ड में चाहिर भीतर व्यापक है, सब मलुए्य. उस सच्चदा» . मन्‍द्‌ परमेश्त्रर फी उपासना से आनन्द प्राप्त. कर ॥ १॥ . ,. .. .. ह यद्द मन्त्र कुछ |मेद से ऋचरवेद में है--१०। &०। १। यछुवेंद ३१। १ और सामबेद पू० ६ । १३। ३। और संमरुत्र पुरुष सूक २२ मन्त्र: यज्ुवेद पाठ फे अचुसार महर्षि दूयानद छत ऋग्वेदादि, भाष्य भूमिका सृष्टि विद्या . विषय्य में व्याज्पात है ॥ जा “ यहाँ पर निल्‍्त लिछित मन्त्र से मिलान करों--ऋऋ० (६० | ४१। हे. शोर .यज़ुर्वेद १७1 १६॥ श्र विश्वतंश्चक्षरुत विश्वतों मुखो विश्वतों बाहुरुतं विश्व- -अिककलक्क, तंस्पात्‌ । स॑ बाहुस्‍्यां घमति सं, पतन व्यविश्तमों जन्यन्ू देव शक ॥ |. - ५ ( विई्वतश्चचुः ) सब ओोर नेन्न धांला+( उत ) और ( विश्वतोमुंस! ) सब और. मुणज.- प्रालां,5(:विश्वतोयाहु: .) सब, ओर ; -सुजाओं। ,वाला... ( डत.) और (चिए्यतस्पात्‌ ) सथ ओर पैरा घाला (एक१) अफेल। ह ( देवता ) प्रकाशस्वरूप परमात्मा (बाइमभ्पाम ) दोनों भुजाधों रूप बल और पराक्रम से ( पतत्रै) ) गति शील परमाणु आदि के संर्थः ( धावामेमी:): य॑ और भूमि[ आदि लेकों.] फो- ( सम) धथापिधि .( जनयन.) उत्पन्न कर फे (सम्‌ ) यथावबत्‌ ( धमति ) प्राप्त- होता है ॥ . विमिः पंद्धि्यामिरोहत पादस्येहामबत्‌ युन/ 1 श ' ब श्री 2 श्र तथा व्यक्रासुदू, विष्वंडशनानशने अनु ॥.२ ॥ हो अल पक न ४ + ४ ६ '» ' चिटसि: पतु-+निः । द्याय । शरोहत्‌ | पातू-3 अस्य 4, दह ॥.. 3 ८९- न जिस 005 नुशने दत्यंशन-अनुशने। अनु ॥ २४ | ,..., ०) कत। ८ लो 'रूर+>प>ज-»म« घ« पता अधभथ भवन +व 5५३५० ०९ भरता ४+५०५भ 3 ा३2५3भ५५कमऊ कम भर भ न मना+ नाम नानक + मन फानननान काका परम 1., 1४ यहा पश्नस्थूलपच्चचुदाभुतानि दशाड्युलान्यशानि यरय-तज्ञपत ॥: । च




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