सांख्य तत्त्व कौमुदी - प्रभा | Sankhya Tattv Kaumudi-prabha

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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| ज अनैक विद्वान्‌ कई कारणों से इन्हें कपिल-झत नहीं मानते । सर्व प्रथम कारण तो यही है कि इनमें कई सूत्र दूसरे ग्रन्थों से से लिए गए हैं । ब्रह्मसूत ४. १.१. ( इत्तिरसक दुपदेश।त्‌ ) सांख्यप्रवचनसूब ४-३ है योग-सूच्र २ ४८६ ( इत्तय पव्चतय्यः क्लिप्टाक्लिप्टा ) सांख्यप्रवचनसूत्र ३.३४ है और फिर श्रागे का ६.२४ सूत्र भी यही है | इती प्रकार २४वीं सांख्यकारिका की सास्विक एकादशक इत्यादि प्रथम पंक्ति संख्यप्रवचन-सूत्र २.१८ है। इसके त्रौर मी. कई अंश सूत्रों में उद्दुत हैं । दूवरा मुख्य कारण यद है कि इन सूत्रों में पश्- शिख के मत का उल्लेख है । जैसे सां०य० सूत्र ५.३२ झाषियशक्तियोग पश्न- शिख तथा ६-६८ ग्रविवेकनिमित्तो वा. पश्मशिख है। यदि सांख्य प्रवचन-सूत्र सचमुच कपिंल-झत ही हैं तो इनमें शिष्य के शिप्य पश्चशिख के मत कैसे उद्धव हुए तीसरा प्रमुख कारण यह है कि इन सांख्य-सूत्रों को किसी . मी प्राचीन ग्रव्थकार ने उद्धृत नहीं किया है | अपने जह्लयून-भाष्य में शझ्करा- चार्य ने कहीं भी सांख्य-सूज्चों को उद्श्रूत नहीं किया है । सांख्यकारिका की टीका. तत्वकौसुदी में वाचस्पति मिश्र ने पश्चशिख वाषगणय इत्यादि को तो उद्धृत किया है पर कपिल को नहीं । यदि ये सूत्र महर्षि कपिल द्वारा रचित मौलिक सूत्र होते तो प्राचीन श्राचार्य परम सिद्ध ऋषि के सूत्रों को उद्घूत न करके उनकी त्पेक्ता सामान्य इंश्वरकृष्ण जैसे मानव की कृति को क्यों उद्धूत करने जाते ? चौदहवीं शताब्दी .के माधवाचार्य तक ने भी श्रपने घड़-दर्शन-संग्रह में कारिकाओओं को ह्दी उद्धद किया है सूत्रों को नहीं । सूत्रों के सबसे पुराने टीकाकार अनिरुद्ध १५०७ ह० के आस पास हुए थे । अत इनको रचना १३८० ई० से १४५० ई० के बीच हुई होगी | पर इसके विपरीत पं० उद्य्वीर शास्त्री ने उपलब्ध सांख्य- सूज्नों को कपिल-रचित सिद्ध किया है । उनका कथन है कि इनमें श्नेक सूत्र प्रक्षिप्त हैं अतः उनके आधार पर समूचे सूतर-ग्रत्थ की श्रर्वाचीनता नहीं छिद्ध की जा सकती | इसका विस्तृत विवेचन आर खण्डन डा० हरदत्त शर्मा की भूमिका के पृ० २२-२५ पर द्रष्टव्य है । कल दसवीं कारिका की प्रथम पंक्ति हेंतुमदनित्यमव्यापि सकियमनेकमाशित लिन्म . 1० म० सून ११२४ एवं २४वीं कारिका की दितीय पंक्ति सामान्यकरणत्रत्ति प्राणा[यया बायव पच सा० प्र० सूत्र २८३१ हैं। द र-दरष्टव्य ओ० बु० ए० पूना से प्रकाशित सांख्यतस्रकौमुददी की भूमिका पे० २२1 येह मत डा० शर्प् ने गाबें के 320 ६४प४ ४06 ०४४ नामक यन्थ (पे० ८.१) से उद्धत .. किया है ।




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