एक प्रश्न | Ek Prashan

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Ek Prashan by भगवतीप्रसाद वाजपेयी - Bhagwati Prasad Vajpeyi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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गज पुरा होते-होते बीच में कट जाता । कभी एक के बाद दूसरा, फिर तीसरा ॥' इसी प्रकार देर तक वह कुछ न कुछ बुदबुदाता रहता । पण्डित वृन्दावन उसकी इस स्थिति पर बड़े चितित रहा करते । उसे अपने कमरे में श्रकेला न' सोने देते, जबकि उसकी श्रवस्था बत्तीस पार कर गई थी । बहुत समय तक वह विवाह को टालता रहा था, इसलिए. बकुल का विवाह पहले हो गया था । कभी सम्पुरणं दिन निकल जाता और कमलेश किसीसे एक दाब्द न बोलता । उन झावश्यक कार्यों के संबंध में वह कोई हस्तक्षेप तो न करता, जिनका निवारण सम्भव न होता, कितु यदि कोई व्यक्ति किसी ऐसी बात के लिए उससे श्राग्रह या अनुरोध कर बैठता, जो उसकी रुचि के विपरीत होती, तो वह प्रायः सुनी-अनसुनी' कर देता । प्रायः उसका मुख उतरा-उतरा रहता । घर के लोगों को यह पूछने का भी साहस न होता “क्यों, तबियत तो ठीक है ?” धीरे-धीरे सब' लोग जान गए थे कि पुछना बेकार है। उत्तर तो कुछ देगा नहीं, संभव है, उठकर कह्टीं चल दे । एक बार ऐसा हुभ्रा कि वह सबके साथ खाना खाने बेठ तो गया, पर फिर दो 'रोटी खाकर उठ पड़ा । मां का जी न माना । पुछा, “क्या बात है बेटा ?” तो बिना कोई उत्तर दिए ्राचमन के बाद तौलिये में हाथ पोंछ बदन में बनियान श्रौंर कमीज डालकर वह बेठक में श्रा गया । -« वृन्दावन ने पूछा, “सुनता हूं, श्राज तुमने खाना नहीं खाया, बड़े !” सिर ऊपर उठाए बिना उसने उत्तर दिया, “जितनी भुख थी उतना खा लिया । उसकी इस बात पर पण्डित वृ्दावन समझ गए कि और जिरह करना बेकार है । उसके इस रंग-ढंग पर घर में चर्चा तो नित्य चलती, कभी सुमित्रा और वृन्दावन में, कभी बकुल श्रौर उसकी नवपत्नी इला में, पर इस समस्या का कोई हल न निकलता । वृन्दावन जानते थे कि बड़ी बहू हमारे घर जितने दिन रही, लेन- पइसददास्ससकासपाशकासाशाइवासइ सटपसससदावथइसाइर अअअसदासकासपससथाायायकयायदकसससकधायससयसयासाध्ससदसायसरसपास्य




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