योगवासिष्ठ की अनुक्रमणि भाग 1 | Yoga Vasistha Anukarmani Bhag-1

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Yoga Vasistha Anukarmani Bhag-1 by खेमराज श्री कृष्णदास - Khemraj Shri Krishnadas

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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1यर् पूर्व पैज्ञायवेशफे अंतर्गत सर्वव्ज्ञात पटियाला माम राजपांनीर्म श्रीसाहचरसिद नामवाछे राजा हुए उनकी दो घहिन विधदायें थीं उनकी अद्वैतमतर्म अत्यत निप्ठा थी इसलिये बेदा तशाखकी ही कथा श्रवण कियाकत्तीथा, एक समय निरणनी साधु रामप्रसादजीक मुखतते इन्होने इस योगवातिष्ठकी कथा श्रवणकरी पश्चात्‌ वेदात्षिद्धातका प्रकाशक सूर्यरूप इस ग्रथकी समझकर इन्होंने विचार किया कि, यह उत्तम अ्य देवबाणीमें होनेते सर्वोपयोगी नहीं इसलिये इसकी भाषा कराकर हम ऐडडीकिक यश जौर पारठीकिक कर्याणफी आहोंदे ऐसा विचारकर फिर उसी ( उक्त ) साधुसे कथाका प्रारम कराया और दे।पडित छिखगेके बास्ते बैठादिये, जैते जैप्ते ये साध कथाका व्य|ख्यान करतेगये वैसे बैसेही पडित्र लिखतेगयें , आशय यह कि, न्याख्यानरूप यह योगवासिष्ठफी सम्पूर्ण कथा पजाबीमिश्र हिंदुस्थानीभापामें डिखीगई और दोनों एस्वकॉकी मिलानकर शुद्ध एक अति वनाहगई। पश्चात्‌ भतिउत्तम द्वोमिके कारण शीमरही यह अथ सब देशोमें अचलित होगया इसलिये इन पूर्वोक्त उपकारपरायणोको हम फोटिशः धन्यवाद देतह कि जिनने परलोकसुखसाधन यह अथ प्रचलितकरके परम उप- कार किया । इस अथके वैराग्यभादे पद ६ प्रकरण हैं उनमें तिस तिस नामवाल्ले अकरणर्मे तिसत तिस विपयका ऐसा वर्णन कियादे कि, मानो साक्षात्‌ सूर्तिमाल्‌ यह विषय उपस्थित इसलिये वेदाततिद्धात इसमें ऐसा दरणाया कि, निसका श्रवण मनन और निदिध्यासन फरनेंसे अबवइयही ममुष्य प्रपचजाठसे छूटकर मीक्षपद्का मागी होजाताहै यह प्रथ भाति झद्ध फराकर में) अपने यप्राठयमें म्रकाशित कियाहै जौर मद्दात्मामोंकी यथारुचिफे फारण मैंने यह दोंम पारसे मुद्रित कियाहे एक मंथसाइज व दूसरा बुकसाइज तथापे बुकसताइन सुन्‌हरी काम कराकर अति उत्तम बनवाईहै और यह सर्च समय विचारोपयोगी होनेके कारण हुकसाइजके दो विभाग कियेगयहे । और महात्माओंसे निवेदनहै कि, इसम कही दृश्िदोपते अश्भुद्धि हों सो क्षमा करें ।आपका छपाकाक्षी-खेमराज श्रीकृष्णदास, .' | “आवेडुटेशर”” (स्टीम ) यन्‍्नाठ्याध्यक्ष,-ववहे:




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