वैदिक संकृति का विकास | Vaidika Sanskriti ka vikasa

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Vaidika Sanskriti ka vikasa by तर्कतीर्थ लक्ष्मण शास्त्री - tarktirth lakshman shastri

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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श्डे भी सिद्ध होता है । सच तो यह है कि ये दोनों कार्य मशाल झथवा श्रमिक उपयोग करनेवाले मानवपर निर्भर हैं । वैज्ञानिक तथा यान्त्रिक संस्कृतिका भी यहीं हाल है । मानवकी नैतिक बुद्धि तथा ज्ञानके भ्रष्ट एवं नष्ट होनके कारण ही मानवोंके विश्वके समूल नष्ट होनेकी भयानक झाशक्ाका उदय हुआ है । मानवके झन्तरककी सदोष प्र्डत्तियोंकी वजहसे मानव-मानवके बीचके सम्बन्ध बिगड़े हुए हैं । क्या सामाजिक सम्बन्ध क्या रा््रॉंक बीचके सम्बन्ध दोनों दोषपूर्ण बने हैं । यह नितान्त झावश्यक है कि मानव अपनी आात्माको शुद्ध करके श्रौर झपनेमें परिवर्तन करके सामाजिक तथा राष्ट्रीय सम्बन्धोंमें भी परिवतन कर दे क्योंकि विश्वके सब प्रकारके सम्बन्धोंका लन्म झ्ात्सासे ही होता है व्यक्ति दी उनका कारण है | ब्यक्तियोंके कुछ दल वर्ग-संगठन या. पत्त- संगठन करके राजनीतिक सत्ताकों प्राप्त करते हैं समाजके आर्थिक जीवनपर नियन्नण॒ रखते हैं और संत्ता- स्पर्धाकी राजनीतिकों श्रपनाते हुए जनताके हितको खतरेमें डालते हैं । झतपव आध्यात्मिक शक्तियोंका ावाहन करनेवाली सद्पहत्तियाँ ही मविष्यके प्रलयकारी संग्रामका परिहार करनेमें समय होंगीं । वर्तमान समयमें एक विश्वव्यापी मानव संस्कृति उतन्न होनेपर उतारू है । झब बड़ा भारी सवाल यदद है कि क्या नवीन मानव-संस्कृति सब पुरानी मानव- संस्कृतियों को झपनेमें समाविष्ट करकें या उन्हें झात्मसात्‌ करके झवतीरण होगी या सब संस्कृतियोंका पूर्ण विसर्जन करके ही उसका उदय होगा माक्संवादी प्रदत्ति जो कि सर्व पूर्ववर्ती संस्कृतियोंका विष्वंस करनेके लिए. बद्धपरिकर है-संसारके सब राष्ट्रॉंको चुनौती देते हुए आगे बढ़ रही है झवश्य किन्तु यह एक मानी हुई बात है कि परम्पराके सम्पूर्ण विनाशसे नव-निर्माण नहीं हो सकता । झगर नवीन अदत्तियाँ परम्पराका पूर्ण विध्वंस करनेके लिए सन्नद होंगी तो सर्वत्र पारम्परिक कलहोंका तथा झराजकताका निर्माण होगा और चारों ओर अंघेर-नगरी एवं अनवस्था झवद्य निर्माण होगी क्रान्ति तो निश्चिय ही न होगी । परम्पराके स्थिर मूल्यों को आत्मसात्‌ करनेकी पद्धतिका झवलम्ब करके ही विकास या म्रगतिकी शक्तियाँ यशको झआर्जित कर सकती हैं । परम्परागत संस्कृतियॉपर नवीन प्रकाश डालनेकी प्रहत्तिमी स्वागताह होती है इसीको जीोंद्धार- बाद कहा जाता है। केवल जीणोंद्धार-बाद जीणोंद्धार करते करते विलीन अथवा परास्त होता है । नवजीवन देनेवाला आन्दोलन ही यश प्रात करनेमें




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