भरत दर्शन | Bharat Darshan

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Bharat Darshan by मुन्नीलाल वर्मा - Munnee Laal Varma

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रकाश-स्तस्भ डे कहीं अन्त में इतिहास-लेखक । वाल्मीकिजी के नायक सूयंबंश- विभूषण झद्धितीय वीर सत्य-प्रतिज्ञ एक-पत्नी-ब्रती एक-शब्द- त्रती एक-बाणु-ब्रती मर भूपाल दृशरथ-पुत्र श्रीराम थे । उनके राम आर तुलसीदासजी के राम में अन्तर दै। तुलसी- दासजी के राम नर भूपाल ही न थे प्रत्युत वे थे (जैसा उन्होंने विभीषण के मुख से कहलाया है ) -- तात राम नहिं नर भूपाला । भुवनेश्वर काल कर काला । ब्रह्म अनामय झज भगरवंता । व्यापक अजित अनादि अनंता ।। सम्भव है कि जब वालमीकिजी ने रामायण की रचना की उस समय तक उन नरोत्तम को पुरुषोत्तम का पद प्राप्त न हुआ हो अथवा देशकाल और सामाजिक परिस्थिति ने (जिनसे कवि एवं लेखक प्रभावित हुए बिना नहीं रहता) दोनों महाकवियों को बाध्य किया दो कि झादि-कवि केवल उन नरपुंगव के मानवी चरित्र का वणुन करें जो उस काल के समाज को श्रेयस्कर रहा हो ्ौर भाषा- कवि तुलसीदासजी उसी चरित्र को नारायणीय रूपक के स्वरूप में प्रतिष्ठित कर अपने युग की झधोसुख समाज को उन्नत करने का प्रयत्न करें । जो भी कारणा हों यह निश्चित है कि वाल्मीकिजी के श्त्रीराम में ब्रह्मत्व गोण एवं मानवत्व प्रमुख है और तुलसी- दास के प्रसु में अ्ह्मत्व रुपष्ट तथा मानवत्व गोणु है । गोस्वामीजी ने पावेती-उद्गोधन-प्रसंग में श्री शंकरजी द्वारा स्पष्ट कराया है --- राम. सनच्चिदानन्द दिनेशा । नहिं तहैँ मोह-निशा-लवलेशा ।) सहज-प्रकाश-रूप..... भगवाना नहिं तहूँ पुनि विज्ञान-बिहाना ||




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