तीस दिन मालवीय जी के साथ | Tees Din Malviya Ji Ke Sath

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Book Image : तीस दिन मालवीय जी के साथ  - Tees Din Malviya Ji Ke Sath
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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पहला दिन६ अगस्तस्नान, भोजन और विश्राम करके तीन बजे के 'छगभग मैने 'वाहा कि महाराज से मि्ें और जिस अभिप्राय को लेकर आया हूँ, उसकी चर्चा छुड्ड ।कपड़े पहनकर मैं दफ्तर में, जो मेरे कमरे की बाल ही में है, गया तो महाराज के निकटस्थ विश्वास-पात्र कर्मचारी ठाकुर शिवधनीरसिंह को दस-बारह आगंतु्कों के बीच में बैंठे पाया ।आगंतु्कों की वेष-भूषा मिन्न-भिन्न आकारं-प्रकार की थी | कुछ तो सूटेड-बूटेड थे, कुछ पंडिताऊ पोशाक में थे, और कुछ सम्प्रदाय-विशेष के थे, उनके माथे पर उनके सम्प्रदाय के तिछक थे । कुछ यूनिवर्सिटी के हलात्र थे और कुछ केवछ दर्श- नारी, जो दूर के किसी जिले से आये हुए किसान-श्रेणी के माठूम पढ़ते थे |ठाकुर शिवधनीसिह से मादूम हुआ कि अमी कुछ लोग महाराज से मिल रहे हैं । इससे मैं सबके मिछ चुकने की प्रतीक्षा में अलग एक कुरसी खींचकर बैठ गया ।बेठे-पैंठे शाम हो गयी । मिलनेवालों का तॉता टूटता ही न था । छुद्दावना समय था | बादल घिरे हुए थे। ठंडी हवा चर रही थी । घुछे हुए; पेड़-पीथे बहुत सुन्दर लग रहे थे | मैंने सोचा कि तबतक विद्व-बिद्यालय की सेर ही कर आऊें ।




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