निराला रचनावली 5 | Nirala Rachnawali 5

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
25.86 MB
कुल पष्ठ :
565
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)वक्तव्य ने लिखा है वहू सवा साल तक पड़ी रही । अन्त मे पं. नरोसम व्यास रे उस जीवच-परिचय को पूरा किया और अनुमानत 1929 ई . (संवत् 1985 वि. ) के आरम्भ में वह पुस्तक प्रकाशित हुई । प्रकादाक थे निहालचन्द एण्ड को. ् सारायण बादू लेन कलकत्ता । सितम्वर 1929 की सुधा में साहित्य-सुसी स्तम्भ के अन्तर्गत यह सूचना दी गयी है कि रवीन्द्र-कविता-कानस करा प्रकाभन-काल है अगस्त 19291 सम्भव है यह पुस्तक प्रेस से कुछ देर से निकली हो था सुधा कार्यालय में ही कुछ देर से पहुंची हो 1 पुस्तक में रवीन्द्रनाथ के जीवन-परिचय का जो अंघ श्री व्यास लिखित था उसे यहाँ छोड़ दिया गया है । इसका एक कारण यह भी है कि उसमें न तो क्रमबद्ध रूप से तथ्य प्रस्तुत किये गये हैं न उसकी दौली मे प्रौढ़ता हैं । कोप पुस्तक के साथ यह अंडा बिलकुल बेमेल लगता था । दिसम्वर 1954 में श्री ओमप्रकादा बेरी ने हिंत्दी प्रचारक पुस्तकालय प्रो. बाँ. नं- 70 ज्ञानवापी बनारस सिटी से रवीर्द्-कल्िता-कानन कापरिवर्धित संस्करण प्रकाशित किया । परिवर्धन इसमें यह हुआ लि इसके अन्त में एक परिशिष्ट जोड़ दिया गया जिसमें डा. महादेत्र साहा द्वारा तैयार की गयी रवीन्द्रनाथ के ग्रन्थों की एक कालानुक्रमिक सुघी दी गयी । हमने बह सुची भी छोड़ दी है क्योकि बह सिराला द्वारा तैयार की गयी नहीं । निराला के आलोचनात्मक निबन्ध विभिन्त पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए थे । कुल सेततीस निबन्धों में से सिर्फ चार निवन्धों के बारे में यह पता नहीं लगाया जा सका कि वे किन पत्र-पत्रिकाओं में और कब निकले थे। थे मिबन्ध हूँ--. साहित्य और भाषा हमारे साहित्य का ध्येय काव्य में रूप और अरूप तथा श्री नन्ददुलारे वाजपेयी । भारम्भिक तीन निबन्ध निराला के प्रथम लिबन्ध संग्रह प्रबन्ध-पद्म (संबत्त् 199 1 वि.) में संकलित हैं जिससे यह निदिचित होता है कि थे उक्त पृस्तक के प्रकाशन के पहले लिखे गये । 16 मई 1934 की सुधा के लये फूल स्तम्भ में दी गयी सुचना के मुताबिक प्रबन्ध-पढ्ा का प्रकादान अप्रैल 1934 में हुआ । पुस्तक में श्री दुलारेलाल भार्गव लिखित जो प्रकाशकीय भूमिका है उसके नीचे 25 अप्रैल 1934 की तिथि दी गयी है । इससे यह स्पप्द है कि यहूं पुस्तक अप्रैल 1934 के एकदम अन्त में ही निकली होगी । तात्पर्य यह कि उक्त तीनों निवन्ध भप्रैल 1934 से पहले लिखे गये । अन्तिम निवस्ध में 7941 ई. का उल्लेख है जिनसे यह स्थिर होता है कि यह निबन्ध उसके बाद के ही बर्पों में लिखा गया होगा । स्वभावतः इन निवन्धों को अनुमित रचना-काल के अनुसार ही क्रम- बद्ध किया गया है । रचनावली के प्रस्तुत खण्ड में संकलित निबन्धों में एक निवन्ध ऐसा भी है जो बिना लेखक के नाम के गसमन्वय में छपा था उसके विविध चिषय स्तम्भ के मन्तगंत वह निबन्ध है--- हिन्दी और बंगला की कविता । इस निधन्ध को नरालाइत मानन का आधार डा. रामविलास दार्मा का यह कथन हैं अमने का विविध विषय स्तम्भ में हिन्दी और बंगला की कविता शीषेंक से उन्होंने निराला ने) लिखे । लेखक के नाम के बिना ही यह लेख छपा । [निराला की पाहित्य-साधना (1) पु. 55 ] इस चिबन्ध को लेकर सिराला के दस निवन्ध दस ? / निराला 5
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