यज्ञोंपवित संस्कार | Yagyopavit Sanskar

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
4.8 MB
कुल पष्ठ :
158
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)हे
.......* यज्ञोपर्बोत-विचार 1
यज्नोपवीत घारण करने को कारण ।
ं इस जीवने अनादिं काल से वड़ी २ मलिन पर्यायें घारण की
डै। जिसके कारण जीव के विशयुद्ध णुर्गोमें भी विशेष मछिनता प्राप्त दो
गई है। जैसी २ मलिन पर्याय इस जीव को प्राप्त होती है. बसे २
कर्मी का विशेष आवर्ण-आत्मगु्णों में मठिनता प्राप्त अस्त टै।
_.. जब तक सांसारिक पर्यायों का धारण करना दै तब तक जीव
को मछिनता नियम से है ही । अशुद्धता आशुद्ध पर्याय के धारण करते
से जीव को प्राप्त हुई दै. । संसारी जीव अशुद्ध जीव कहलाते हैं। और
बह अयुद्धता अथुद् पर्याय घारण करनेसे ही है। सिद्ध जीव ' परम
दिन ओर परम नियंठ हैं कारण एक यही है कि सिद्ध जीवों की
उशुद्ध पर्याय का धारण करनो सब था न होगया है । वे सब प्रकार
क इसे निमुंक्त दोगएहैं; इसी छिये अमूर्तीक, अविनाशी , निरंजन
. यदु को प्राप्त होचुके हूं । इसल्यि जीवों को संसारी पर्यायों का धारण
_ करना मछिनता और अशुद्धता का कारण है।
संसारी जीबों को मठिनता के कारण राग ढष भी हैं । जिन
जोवों को मोदद क्रोध मान मध्य छोभादि रूप विषयकषायों की विशेष
उम्रता है। परिगा्मों में जिनके विशेष मोहादिदुर्भावों :की कछुपता डर
उन जीवॉको दी मछिन पर्याय अधिकतर प्राप्त होती हैं। नदीन पर्वाय -
'यारण करने के कारण जोतों के मोद्दादिरुप दुर्भाव अधिक होते हैं ।
सरक गति में-इस जीवकों कैसी मछिन पर्याय प्राप्त होती है
उधम वीमत्स और ग्ठानि पूर्ण वे क्रिपक झरीग्में जीवों को अपनी
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