आनन्द गीता | Aanand Geeta

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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गीता का सारश्रात्ता प्रमर है। इच्छाप़ों का दमन करो । निष्काम भाव ,. सब की सेवा करो । परमात्मा का ही सतत ध्यान करो । ४ :.' विभ्रुतिमत्ता के दर्शन करो । देवी सम्पत्‌ संग्रह करो । ६९% के बीच भी मन को समान प्रौर सन्तुलित रखो । पूर्ण: :- करो। यही परमात्मा के द्शतों का मागे है ।मोक्षप्रिय ने कहा--हे स्वामिनू, मुझे ग्राज गीता के तत्त्व का उपदेश दीगिए।. मुक्त गीतोपदेश की उत्कट शमिलाषा है ।स्वामी शिवानन्द जी कहते हैं-श्रात्मा शाश्चत है, सवंव्यापक ग्रौर श्रमर है। यहू ४०१ तुम्हारी हृदय-गुह्दा में विराजता है । शरीर-विनाश हो जाने +' भी यह जीवित रहता है ।सब श्राशाश्रों को त्याग कर श्रात्मा ही में सत्तुष्ट रहो! काम-लिप्सा, भय ग्रौर क्रोध से मुक्त रह तथा मोहपाश मे ॥' हटकर, श्रद्वेत-निष्ठा की प्राप्ति और श्रात्मा के शखत +। ” की भ्रनुभ्ुति करो ।तुम्हारा कत्तंव्य है कि कर्म करते जाग्नो। परिणाम * सुफल की ब्राशा करना तुम्हारी श्रनधिकार चेष्टा है। शरण फलाशा से मुक्त रह कर प्रत्येक कम करते रहो ।ठृण्णा से परित्रजित, मोहपाश से श्रसंस्पृष्ट तर्था की ममता से विमुक्त व्यक्ति ही शाश्वत शास्ति का भागी होता है 'नाप




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