राजस्थान का लोक - संगीत | Rajasthan Ka Lok-sangit

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अध्याय २सौन्दयस्वर-सौन राजस्थानी लोकगीत अन्य ग्रान्तों के गीतों की तरह ही जन-जीवन के छत्यन्त निकट रहे दूं ्ौर उसके उत्थान-पतन की कहानी को उन्द्ोंने वड़ी सचाई के साथ चित्रित किया है | आदि काल से दी रोना तर गाना मनुष्य कां जन्मसिद्ध अधिकार रहा है और प्रत्येक मनुष्य किसी न किसी रूप में रोता और गाता ही है। इसी रोने छीर गाने को उसने स्वेप्रथम दुख शीर सुख के क्षणों में गुनगुना कर व्यक्त किया है. । भावोद्रे क के उन्द्दीं तीव्र क्षणों में उसकी गुनगुनाइट विविध रूप धारण करती रद्दी वीर उसके साथ दीं शब्दों की सृष्टि भी दोती रद्दी । अत यद्द भी निश्चित ही है कि मनुष्य के ट्ृदय में पदले स्वरों की उत्पत्ति हुई 'और बाद में शब्दों की । शास्त्रीय संगीत या शास्त्रीय सादित्य में यदद क्रम उलट जाता दे-- पहले शब्दों की सण्टि की जाती हैः ीर बाद में उन्हें स्वर दिये जाते हैं । थतः यद्द तो सिद्ध है कि लोकगीतों की ध्वनियों को समझे बिना उसके शब्दों के मददत््व को पूरी तरदद समझाही नद्दीं जा सकता ।परन्तु जब से लोकगीतों की तरफ जनता की रुचि जायृत हुई है तभी से पद्दले गीतों के साहित्य की छोर ध्यान गया है, उनकी ध्वनियों की तरफ नहीं । ग्रह्दी कारण हैः कि राजस्थान के कई विद्वानों ने लोक- गीतों के सम्बंध में पुस्तकें प्रकाशित की टैं । निश्चय दी उनसे साहित्य की सेवा हुई है, परन्तु गीतों का संगीत पक्ष अब तक उपेक्तित रददा है ।राजस्थान के नेक गीतों के परीक्षण से यद्द सिद्ध होता हैः कि राजस्थान का लोक-संगीत चहुत ही गम्भीर 'औीर गर्व करने योग्य है । संगीत की दृष्टि से इन गीतों का वैज्ञानिक विश्लेषण भी किया जा सकता है तथा गीतों की स्वर-रचना के परीक्षण से यह भी पता लगाया जा सकता हैः कि 'मुक गीत किन परिस्थितियों के बीच शुजरा और उसकी स्थर-रचना के पीछे किस भावना की प्रधानता रही । क्योंकि हम यद्द तो जानते दी हैं कि लोकगीतों की रचनायें स्व्राभाविक भावोद्रेक की स्थिति




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