नीति - शास्त्र | Neeti Shatra
श्रेणी : साहित्य / Literature

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
257.97 MB
कुल पष्ठ :
411
श्रेणी :
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लेखक के बारे में अधिक जानकारी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)कह; टन रद... कि व _ नीति-शास्त्रा पेव्यतीत करने के उपाय नहीं सिखाता । नियामक विज्ञान का कार्य आदेश की परि--
भाषा देना है, आदर्श सिद्धि के नियंमों का वर्णन करना नहीं । सौर्द्यं-विज्ञाक
_ नियामक विज्ञान है । यह सौन्दर्य के आदशशं से सम्बन्धित है; किन्तु सुन्दर वस्तु की
“रचना कैसे की जाये, यह प्रश्त इसके कार्य का कोई अंग नहीं । अतः नीति-शास्त्र,
नियामक विज्ञान होने के नाते, शुभ अथवा सत्कमं के आदशं का विवेचन करता है
और उसकी प्राप्ति के साधनों से इसका कोई सीधा सम्पकं नहीं है । यह हमें जीवन
_ के पथ-प्रदर्शक सिद्धान्तों का ज्ञान देता है, किन्तु उन. सिद्धान्तों का उपयोग कंसे वियाजाये, इसका कोई सम्बन्ध नहीं है । यद्यपि नी ति-शास्त्र नियामक विज्ञान है, तथापि
_ व्यावहारिक विज्ञान नहीं है । वस्तुतः नी ति-मीमाँसा के अध्ययन का हमारे नेतिक_ जीवन पर कुछ प्रभाव तो अवद्य ही पड़ता है । अतः .यह हमारे व्यवहार को प्रभावित
' करता है । किन्तु इस कारण नीति-शास्त्र क्रियात्मक विज्ञान नहीं बन जाता ।नीति-शास्त्र कला नहीं है । यदि नीति-शास्त्र को . व्यावहारिक विज्ञान नहीं
कहा जा सकता तो कला तो कदापि थी नहीं कहा जा सकता ।. हम व्यवहार की
कला वी तो कल्पना भी नहीं कर सकते । विद्या की कोई भी शाखा हमें नतिजीवन की कला नहीं सिखा सकती । यदि यह मान लिया जाय कि यह हमें नतिक
शिक्षा अथवा नैतिक व्यवहार के नियम दे सकती है, तथापि यह हमें उनका क्रियाएमक
_ प्रयोग नहीं सिखा सकती । नैतिक शिक्षा से अनशिज्ञ होने पर भी सम्भव है कि हमचरित्र की दुबंलता और संकल्प शक्ति के अभाव के कारण उस काय-रूप मे परिणित
न कर पायें । नैतिक जीवन की कला की शिक्षा के लिये “उपदेश की अपेक्षा उदाहरण:'बरणीय है” और व्यक्तिगत नैतिक अनुभव तो दोनों से श्रेष्ठ है। अत: यदि नीकि.शास्त्र का कार्य व्यावहारिक विज्ञान होने के नाते, उपदेश देना भी होता, तब भी:वे नैंतिक-जीवन की कला की शिक्षा के लिये अपर्याप्त होते । इस प्रकार, नीति शास्त्र
न तों व्यावहारिक-विज्ञान है, न कला । यह एक नियामक विज्ञान मात्र है।न क्या व्यवहार की कला सम्भव है ? व्यवहार की कला कहना अनुपयुक्त है ।. कला” का प्रयोग विभिन्न अर्थों में किया जाता है । शिल्प कलाओं व ललित कलाओं
की प्रकृति समान नहीं है । शिरप-कलाओं का उद्देश्य उन वस्तुओं का उत्पादन है जो
किसी दूरस्थ प्रयोजन के लिये उपयुक्त हैं, जबकि ललित कलाओं का उद्देश्य उन
... वस्तुओं की सृष्टि है जो स्वत: वांछनीय हैं । एक उपयोगी वस्तुओं का उत्पादनदि .. करती है; दूसरी स्वत: मुल्यवान वस्तुओं का । तथापि दोनों का एक निश्चित फलप्प।
पं
रे।
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