धर्म शिक्षा | Dharm shiksha

Dharm shiksha by लक्ष्मीधर वाजपेयी - Laxmidhar Vajpeyi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( १३ ) मेरे सामने नहीं श्रा सके । श्रतएव श्रशुद्धियां बहुत सी रह गई हैं, जिनका मुझे दुःख है । झागामी आवृत्ति में “अच्छी तरह संशोधन किया जायगा |) ' “घर्मशिक्षा” का प्रचार जलता में उत्तरो्तर बढ़ता रहे, ' यहाँ भगवनान्‌ से प्रार्थना है । कलकत्ता... ..... ”. ताक्ष्मोधर वाजऐयी माघ शुवल ७ सं० १६१६७ चि० आठवीं आवृत्ति घर्गम शिक्षा की झाठवीं '्ावत्ति बड़ी कठिनाई में निकल - रही है | युद्ध के कारण कागज शोर छपाई का दास इतना बढ़ - ' गया है कि मजबूर होकर पुस्तक का मल बढ़ाना पड़ा । आशा है. परिस्थितियों पर ध्यान रखकर धर्मशिक्षा के पाठकगण . अवश्य मा करेंगे । सोसदेव वाजपेयी (प्रकाशक) न्री-आदृचि '. “घर्मशिक्षा” की नवीं- ावत्सि 'बहुत ही विपरीत समय इमें निकालनी पड़ी है । कागज का भाव अभी भी वैसा हो है । इस बार हमें मजबूर होकर जरा मेला कागज लगाना पढ़ रद्दा है वर्योंकि हमें जो सरकार देगी वही हम इस्तेमाल ''+ करेंगे। आशा है कि--'घर्म शिद्ा” के प्रेमी पाठक इस जुटि . के लिये भ्रमा करेंगे ओर पुस्तक को प्रेम से 'पनायेंगे । प्रकाशक. ' १-१-४६




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