पुस्तकालय | 1071 Pustkalay 1948

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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[ १६ पुस्तकालय : राष्ट्रनिर्माणकारी संस्था स्वतन्त्र भारत को पुल्तकालय का उपयोग एक राष्ट्निर्माणुकारी सस्था के रूप में करना पड़ेगा | ब्रिटिश सरकार ने १४५ झगस्व को भारत को उपनिवेश पद दे दिया और जूत १६४८ तक उसे पूर्ण स्पतत्र पद दे देने की घोषणा की है । उसके पूर्व झालस्य, झवःपतन तथा पराघीनता हो सकती है। श्र स्वतन्त्रता की ज्योति की जगमगाइहट, जासति की लहर और झपने-ञपने कते- व्यो की जिम्मेदारी का झनुभव, सभी कुछ समव है। पिछुले ५० वर्षों से भारत स्वतत्रता की दिशा में इद्ता से बढ़ा चला झा रहा है। किन्व झत्र पुन- रु.धान तथा झपने पद की सुरक्षा के लिए भारत को पहले से कहीं झधिक उद्योग कएना चादिये। स्वतंत्रता को लाने के लिए भारत को जिस प्रकार का उद्योग करना पडा हैं उसी प्रकार का उद्योग करते रहने से झत्र काम नहीं चल सकता ।. मारतीयों के जीवन को सफल बनाने के लिए झत्र कुछ श्र दी ढंग के उद्योग की श्रावश्यकता है । पराधीनता के बन्धनों को तोडने के लिए; निःशस्त्र भारत को झपनी भावना प्रधान प्ररेणा का ही एकमात्र सद्दारा था। जिस असीम शक्ति के द्वारा भारत ने विगत ५० वर्षों मे झपना पुनर्निर्माण किया है वह शक्ति कहाँ से श्राई ! उस शक्ति-ख्रोत का उद्गम-स्थान केवल मावनाएँ थी , वे भावनाएँ: जो कि जातीय गौरव की विद्य,तूशक्ति, नेतृत्व श्र श्रदुधा से आविसूतत हैं । उन भावनाओं को जगाने के लिए, विशेष कर जनशक्ति को जागरित करने के लिए, छपे शब्दो की झ पेक्षा बोलने की श्रधघिक झाव- श्यकता थी | लोगों में निहित गुप्त शक्ति को शीघ्रता और वेग के साथ जगाना था। ओर, उसके जगानेवाले कौन थे ? उसके जगनेवातले थे ज्योति-पूर्ण नेत्र, सजीव वाणो, प्रमावराली व्यक्तित्व जो शब्दों के श्रर्थ को सूकषमता के साथ विस्तृत करने को तथा परिवर्तित करने की क्षमता रखते थे। तातय यह है कि जनता के सामते साक्षात्‌ उपस्थित होनेवाले शक्तिशाली व्यक्तित्व के समर्थ प्रमाव की नितान्त श्रपेक्षा थी |




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