हिंदी साहित्य का वृहत इतिहास | Hindi Sahitya Ka Brihat Itihas Part -1

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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६ दृष्टि से रंगमंच का विशिष्ट स्थान है। रंगमंच का बहुत संक्षितत वर्णन पंचम श्रध्याय में है । संस्क्त साहित्य के दृश्य काव्य प्राय श्रमिनेय थे जिनका प्रदर्शन रंगमंच पर होता था । मुसलिम श्राक्रमणों से श्रमिनय कला तथा रंगमंच को बहुत धक्का लगा । परंतु रंगमंच मरा नहीं । संस्कृत नाटकों के थाषांतर तथा मौलिक नाटकों में से बहुत से अभिनीत होते रहे। इस श्रध्याय में रूपक श्रौर श्रमिनय के संबंध रूपक के मेद हिंदी नाटक और रंगमंच श्रभिनय शाख्र श्रौर साहित्य एवं कला श्रादि प्रश्नों पर प्रकाश डाला गया है । इस भाग का अंतिम पुंचम खंड बाह्य संपक तथा प्रभाव है । भारत प्राचीन काल से ही सम्य श्रौर संस्कृत तथा एशिया के दक्षिण के मद्दान. देशों में मध्यवर्ती होने के कारण संसार की श्रन्य सभ्यताश्रों श्रौर संस्कृतियों के संपक संवर्ष श्रौर समन्वय में प्रमुख भाग लेता थाया है । पौराशिक परंपरा के श्रनुसार भारत से कई मानव धाराएँ मध्य एशिया तथा पश्चिमी एशिया तक पहुँचीं जिससे विविध भाषाओं और साहित्यो का संगम श्रत्यंत प्राचीन काल में प्रारंम हो गया । इसके परचात्‌ इन देशों से मानव जातियों लगातार भारत में श्राती रहीं श्रौर श्रपने साथ अपनी भाषाएं श्रौर साहित्यिक परंपराएँ भी लाती रहीं । न्यूनाधिक मात्रा में बलाबल के झनुसार श्रादान प्रदान चलता रहा । यह लंबा इतिहास पॉच शाथ्यायों में संक्षिप्त रूप से वर्णित है। प्रथम में यवन-पहवों से पू्व॑पद्चिमी एशिया तथा भारत के संबंध तथा भारत के ऊपर सुमेरी बाबुली तथा इंरानी प्रभाव का श्राकलन है । द्वितीय में यवन-पहच प्रभाव का सीमा निर्धारण ततीय में शक-कुषण प्रभाव का श्रौर व्वठुथ में हूण-किरात प्रभाव का विवेचन किया गया है । झबतक की श्रानेवाली जातियाँ इस देश को श्रंशतः प्रभावित करते हुए भी यहाँ के जीवन में पूणत। विलीन हो गईं । पंचम श्रध्याय में श्ररब ठुक मुगल तथा युरोपीय प्रभाव का विश्ठेषणु है। श्ररब तु शरीर मुगल श्रपने राजनीतिक प्रसार में किंतु इसलाम से श्नुप्राणित होकर यहाँ श्ाए थे । उनको झपने घम संस्कृति तथा भाषा का श्रात्रह था । वे भारतीय जीवन में संपूर्ण खो जाने को तैयार नहीं थे । बहुत दिनों तक उनका जीवनक्रम स्वतंत्र श्र वहाँ के जीवन के सामानांतर चलता रहा । परंठ संपर्क श्रौर सांनिध्य का तक तो श्रपना कार्य करता रहता है। स्थिति के वशीभ्ूत होकर दोनों को पक दूसरे के निकट श्राकर श्रादान प्रदान करना पड़ा । जीवन के श्रन्य क्षेत्रों के साथ हिंदी भाषा श्रौर साहित्य ने इन जातियों से बहुत कुछ ग्रहण किया । युरोपीय झुद्ध आक्रमणुकारी श्रौर शोषक थे । वे भारत _ में बसने नहीं श्राए थे । श्रतः भारत में श्रत्यंत वर्जनशीलता के साथ रहे उनके श्रादान प्रादान का प्रइ्न ही नहीं था । उन्होने श्रपनी राजनीतिक सत्ता की तरह देश पर श्रपनी भाषा श्रौर संस्कृति का श्रारोप करने का प्रयत्न किया । परंठ केवल ब्ारोप के द्वारा अ्ँगरेजी भाषा श्रौर युरोपीय संस्कृति का प्रभाव भारत पर उतना




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