प्रजातन्त्र की ओर | Prajatantra Ki Aur

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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राजा कौन ? जापानी अपने सम्नादू को किसी देवता से कम नददीं समभते 1? क्या यह श्रद्धा वतमान राजाओं के व्यक्तित्व के कारण है अथवा उस पद के लिए जो सदियों से चला आ रहा हैं ? किसी पद की महिमा तभी बढती है जब उसके साथ अधिकार की एक बहुत बड़ी शक्ति हो या उस पर अरूद व्यक्ति कोई दैवी या अभूतपूर्व शक्ति रखता हो | बड़े-बड़े मठों को गद्दी की महिमा शव तक इसीलिए. है कि किसी समय कोई पहुँचे हुए साधु-सन्यासी वर्दी रदते थे श्र उनकी विभूतियों पर विसुग्ध होकर कुछ घनी-मानी लोगों ने दज्ञारों की जाय- दाद उन्हें सुपुद कर दी । यद्यापि अब वे जीवित नहीं रहे परन्तु उन्हीं के . नाम पर मठों की स्थिति क़ायम है । इमारे प्राचीन इतिहास में राजा को ईश्वर का श्रंश माना गया था परन्तु बाद में राजा की देवी शक्ति में लोगों का विश्वास नहीं रहा । वैज्ञानिक युग की करामातों ने इसे अन्धविश्वास कह कर दूर कर दिया । किसी भी देश का राजा अपने पद के कारण किसी विशेष योग्यता का शधिकारी नहीं समभका जाता । उसके श्रन्दर प्रबन्ध-शक्ति संगठन-कला तथा राज्योन्नति की कोई नवीन योजना है तो लोग उसका श्रादर अवश्य करते हैं । शाब्दिक रथ के कारण लोगों की वह श्रद्धा अब जाती रही जो जीते-जागते प्रतिभाशाली राजाओं में थी । कुछ समय पूर्व राजा विलासिता की सामग्री माने जाते रहे | जैसे हम मन के झानन्द के लिए अपने शरीर पर कुछ वस्वुएँ घारण करते हैं वैसे दी समाज ने राजा को धघारण किया है । ब्रिटेन की पार्लियामेन्ट में यह प्रश्न उठाया जा चुका है कि राजा के न रहने से समाज को क्या द्दानि है | चूँकि समाज परम्परा का दास होता है इसलिये उसका पद श्निवाय दो गया है । जब उसके अधिकार श्रौर कर्तव्यों का प्रश्न उव्ता है तो लोग एक स्वर से मानने को तैयार हैं कि उनकी उसे श्ावश्यकता नहीं है । ऐसी दशा में किसी विचारवान व्यक्ति को इस वात के मानने में कठिनाई न होगी कि राजा का प्राचीन गौरव उसकी प्रतिभा उसका झ्धिकार तथा राजनीतिक मददत्य १वालोपि. नाव मन्तब्यों मनुष्य इति मूमिप महददती देवताह्मपा नर रूपेण तिष्ठति ।




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