ब्रजनिधि - ग्रंथावली | Brajnidhi Granthawali

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( २२ ) की कविता उक्त सब गुणों को ध्रपने ढंग पर घारण करती हुई स्फीत निरामय श्रौर शुद्ध-रनात भावें को रसीले-चटकी ले-चुकी ले- पन से सीधा-सादा रूप प्रदान करती है। परंतु प्रजनिधिजी के भावों का शनूठापन हमें कुछ बढ़कर जैँचता है । दोनों कवियों में बहुत छट़मुत्त भावुकता भक्ति की श्रनन्यता सनाभावां की सत्यता श्रौर गंभीरता झलाकिक है। दोनों के समान दुष्ट श्री राघा-कृष्ण वा ध्रौर निकट जाने पर श्री नागरी शुण-झागरी राधिकाजी ही हैं | इन देनी राजस कवियों के अंधों में जा झ्ानंद भरा हुभ्ा है उससे कट्टी बढ़कर श्रसंद उनके पढ़ें घोर गायन-निबंधों में हैं दाने के पद प्राय रकसाली श्रार रसीले हैं जिनके गायन-समाजी झ्रार वेष्णव-भक्त बड़े चाव थार मनेायाग से गाते तथा याद रखते हैं । किसी समय मद्दाराज नागरीदासजी के एक सद्संगी मित्र महा- राज श्रजनिधिजी के पास जयपुर में थे । एक दिन न्जनिधिजी श्री भग- चान्‌ के पद सर्मापत कर रहे थे+। पदले ते उन्द्देंलि यह पद कहा-- सुरति लगी रहे नित मेरी श्री जमुना चूदाबन सों । निस-दिन जाइ रहें उतही हैं साोचत सपने सन सो ॥ बिना कृपा वृपभान-नदिनी बनत न बास कोारिहू घन सो । द्जनिधि कब दोहे वह धासर श्ज-रज लोटी या सन से ॥ २३ ॥ --यजनिधि-पद-संग्रह फिर दूसरा पद कह्ा-- हुम घ्रजबासी कबे कहाइहैं । प्रेम-मगन छह फिरें निरंतर राघा-माइन गाइड ॥ सुद्ा तिक्षक माछ चुसी की तन सिंगार कराइडैं 1 श्रीजमुना-जर रुचि से झचर्व सहाप्रसादडि पाइरं मकर # किसी किसी के मत से जाधघपुर के महाराज थे 1




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