तुलसी - शब्दसागर | Tulasi-shabdasagar

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Tulasi-shabdasagar by डॉ. भोलानाथ तिवारी - Dr. Bholanath Tiwariधीरेन्द्र वर्मा - Dheerendra Vermaपं. हरगोविंद तिवारी - Pt. Hargovind Tiwariबलदेवप्रसाद मिश्र - Baladevprasad Mishrमाताप्रसाद गुप्त - Mataprasad Gupta

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डॉ भोलानाथ तिवारी - Dr. Bholanath Tiwari

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पं. हरगोविंद तिवारी - Pt. Hargovind Tiwari

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बलदेवप्रसाद मिश्र - Baladevprasad Mishr

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माताप्रसाद गुप्त - Mataprasad Gupta

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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११] श्रटकठ-(अनु०)-बेढंगा टेढा-मेढा अटखट । अटकत-अटकते हैं रुकते हैं उलभक जाते हैं । उ० भटकत पद अद्टेतता अझटकत ग्यान गुमान । (स० ३४७) अटकै- १.फँसे २.अड़े रुके । उ० 9.तुलसिंदास भवन्रास सिटै तब जब मति यदि सरूप अटके । (वि० ६३) ्रुटकल-(१.) अनुमान करुपना अंदाज़ । बटखट-गएअनु०)-अट्सइ अंड-बड टूटा-फूटा । उ० बॉस पुरान साज सब अट्खट सरल तिकोन खटोला रे। (बि० १८४) श्रटत-घूमता फिरता है। उ० जोग जाग जप बिराग तप सुतीरथ अटत । (वि० १२४) । झटो-घूमो । उ० न सिटे भवसंकट दुर्घट है तप तीरथ जन्म अनेक झटो । (कण छाप) टन-(सं )-घूमना यात्रा करना । उ० चले राम बन अटन पयादें । (सा० २३११२) टनि-सं ० अट)अट्टालिकाओं पर अटारियों पर। उ० निज- निज अटनि सनोहर गान करहिं पिकबेनि। (सी० ७1२१) तटन्ह-छटारियाँ अद्ालिकाएँ । उ० श्रगटहिं दुरहिं झटन्ह पर भासिनि । (मा० १३४७२) अय्परि-(१) दर . अट-पटी टेढ़ी रे. गूढ कठिन । उ० १. जदुपि सुनहि मुनि अटपरटि बानी । (सा० ११३४३) अटपटे-झनोखा विचित्र । उ० सुनि केवट के बैन प्रेम लपेटे अटपटे । (मा ० २1१००) अटल-(सं०)-जो न ले दृढ़ स्थिर । उ० तुलसीस पवन नंदन अटल जुद्ध कु कौतुक करत । (क दे। ४७) व््टवी-(सं ०)-बन जंगल । उ० चबरृष्णि कुल कुमुद-राकेस राघारमन कंस बसाटवी-धूमकेतू । (बरि० २) श्रटारिन्ह-(सं० अट्टाली)-झअटारियों पर । उ० बहुतक चढ़ीं झअटारिन्ह निरखहि गगन बिसान । (मा ० ७+३ख) अटारीं- कोठे पर अटारियों पर । उ० निलुकि चढ़ेठ कपि कनक अटारीं । (मा०५ ५२११) अटारी-कोठा छुजें घर के ऊपर की कोठरी या छुत । अट्नि-(स० अट्)-छटारियों पर । उ० हाट बाट कोट आओटठ अट्निं अगार पौरि खोरि-खोरि दौरि-दौरि दीन्ही अति औआागि है । (क० श0१४) लि अट्हास-(सं०)-ज़ोर की हँसी खिलखिलाकर हसना । उ० अइहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास । (सा० श२४) ठारद-एँसं० अष्टाद्श)-एक संख्या १८। उ० पदुम अरारह जूथप बदर । (मा० २1१४२) ग्रडोल-गएँसं० अझ+ दोल)-नहीं डोलने वाला स्थिर अटल । तढुक-(£) ढोकर चोट । उ०फोरहि सिल लोढ़ा सदन लागे अढुक पहार । (दो० ६०) हद झढ़कि-लुढ़क कर ठोकर खाकर । उ० अढकि परहि फिरि हेरहि पीछे । (सा ० २१४३३) अखिमा-(सं०)-अष्ट सिद्धियों में पहली सिद्धि जिससे योगी अणुवत्‌ सूचमरूप घारण कर लेते हैं और किसी को दिखाई नहीं देते । झणिमादि-अखणिसमा झादि झाठ सिद्धियाँ-3. अखिमा-बहुत छोटा होने की शक्ति । २. महिमा-बहुत बड़ा हो जाने की शक्ति। ३. गरिमा-बहुत भारी बन जाने की शक्ति । ४. लघिमा-बहुत हलका बन जाने की _ झ्टकठ-श्रतिथि शक्ति। १. प्राप्ति-सब कुछ पा जाने की शक्ति । ६. प्राकास्य- सभी सनोरथ पूरा कर लेने की शक्ति । ७. ईशिव्व-सब पर शासन करने की शक्ति । ८. वशित्व-सब को वश में करने की शक्ति । उ० ज्ञान विज्ञान बैराम्य ऐश्वर्य-निधि सिद्धि अणिसादि दे भूरि दानम्‌ । (वि० ६१) अरु-(स०)-परमाणु से बढा कण अतिसूच्म रजकण । तअतंक-(स० आतंक)-झातंक भय डर । तनु-(सं०) १. तनरहित बिना तन का २. कामदेव । उ० १. रति अति दुखित अतजु पति जानी । (सा० १1२४७1३) तक-(सं ० अतक्य)-जिसके विषय में तके न किया जा सके । त्तक्य-(सं०)-तकंर हित जिसके विषय से तर्क न किया जा सके । उ० रास अतक्ये बुद्धि सन बानी । (सा० १1१२१।२) अति-.सं०)-बहुत अधिक उयादा । उ० में अतिदीन दयालल देव सुनि मन अनुरागे । (वि० ११०) अतिनास- (सं० अतिन नाश)-ससूल नाश । उ० रामचरन-झनुराग- नीर बिनु मल अतिनास न पावे। (वि० ८२) श्रतिबल- (सं ० अति + बल)-झत्यंत बलवान । उ० बहुरूप निसिचचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहि बने । (मा० श३। छु०१) ब्यतिबलो-झत्यन्त बलवान भी । उ० गनी-गरीब बड़ो- छोटो बुध मूढ़ हीनबल अतिबलो । (गी ० १1४२) । अति- बलौ-(सं०)-दोनों अत्यंत बलवान | उ० छकुदेन्दीवर सुन्द्रचतिबली विज्ञान घामाबुभौ । (सा० 91१। श्लो०१) अतिहि-झत्यंत ही बहुत ही । उ० ठाकुर झतिहिं बड़ो सील सरल सुठि । (वि० १३५) अतिह्ी-झत्यंत ही बहुत ही । उ० झतिषी अनूप काहू भूप के कुमार हैं । (क० २1१४) शतिउकुति-(सं ० अत्युक्ति)-बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बात । उ०५ सुनि अतिउकुति पवन सुत केरी । (सा० ९191२) ततिकल्प-(स०)-महाकरुप पुराणानुसार उतना काल जितने में एक ब्रह्मा की आयु पूरी होती है। ३१ नील १० खरब ४० अरब वर्ष । उ० सत्य संकरुप अतिकल्प कर्पांत करत करपनातीत अझहितल्पवासी । (वि० १४) अतिकाय-(सं०)-रावण का पुत्र जो स्थूलकाय होने के कारण झतिकाय नाम से प्रसिद्ध था । बहा की तपथ्या करके इसने वरदान से कवच अस्त्र दिव्य रथ और सुरों तथा असुरों से अवध्यत्व प्राप्त किया था । एक बार इसने इंद्र को परास्त किया था और वरुण पाश नामक अस्त उनसे छीन लिया था। कुंभकर्ण के मारे जाने पर इसने घोर युद्ध किया और शभ्रंत में लक्ष्मण के हाथ से मारा गया । उ० मार झतिकाय भट परे सहोदर खेत । (श्र० है 1७1 १ अति काया-दे० अतिकाय । उ० अनिप झकपन झर अति- काया | (सा० ९४९६।१) अतिकाल-(सं०)-१ . कालों के भी काल महाकाल रे. कुसमय ३. देर । उ० १. काल अतिंकाल कलिकाल व्यालाद-खग त्रिपुर मर्दन भीम-कमे सारी | (वि० ११) अतिक्रम-(सं०)-सीमा पार कर जाना नियम या मर्यादा का उलंघन । उ० कालु सदा दुरतिंक्रम भारी । (सा० ७1२ ४४ ) तिथि-(सं०)-१. अभ्यागत जिसके आने की कोई तिथि न हो मेहमान पाहुन रे. एक अकार के संन्यासी हे.




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