श्री तत्वार्थ सूत्र [हिंदी सानुवाद] | Shri Tatvartha Sutra [Hindi Sanuvad]

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( १३२ तत्वाध सच दििविंप्कम्साः पूर्वपू् परिक्षिपिणों बलया क्रतयः ॥ ८ ॥ तन्मध्ये मेरुनामिरती योजनशतसहख थिप्कम्भो जम्बूदीप गा £ तत्र भरत हमवतहरिविदहरम्यकहरएयवंतरावतवर्पः छषत्रा- खि॥ १० ॥। तदथ्रिभाजिनः पूवापरायता हिमवन्मददाहिमवन्निपघनीलरुक्मि- शिखरिणो चर्पघर पत्ता ॥ ११॥ द्विधातकीखरडे ॥ १२॥ पुप्कराधच ॥२३॥ श्राक मनुप्योत्तरान्‌ सनुष्याः ॥ १४ ॥ आयोम्लिच्छाथ ॥ १४ ॥ भरतेरावतविदहाः कर्मभूमयो5न्यत्र देवहरुत्तरइरुम्यर। १ ॥। नृस्थिती परापरे त्रिपल्यो पमान्तर्मुर्र्ते ॥ रै७ 1 तियंग्योनीनांच ॥ १८ ॥ झ्थ-उजमस्वूदीप श्रादि शुभ नामचाले दीप श्र लव- णादि शुभ नामवाले ससुद्र हैं ॥ ७ ॥ ये दीप समुद्र पक दूसरे से द्ियुण द्ियुण॒ चिस्तार चाले तथा पूर्व पूवे के ढीप समुद्र पर पर के दीप समुद्र से चेष्ति हैं घिरेडवे श्ौर वलयाकार-- चूड़ी के श्राकार गोल हैं ॥ ८ ॥ ः इन डीप समुद्ों के मध्यभागमें लक योजन विस्तार




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