साहित्य विनोद | Sahitya Vinod

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Sahitya Vinod by अशोक वाजपेयी - Ashok Vajpeyi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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छूड़ाया बल्कि समूदी आधिभीतिक पृष्ठभूमि से भी और उस केंद्रीय घुरी से भी जिसने मुझे स्वर्ग और रहस्यवाद से जोड़ा था । फिर भी बचपन के बीच बचे रहे शैतान फ़रिश्ते परम पिता यह एक बहुत जटिल मसला है और इस पर बात करना मुझे कठिन लगता रहा है। मिस्संदेहू मैं अनास्तिक हूं । कोई रिआयत न देने वाले मुझे निश्चय ही यात्रिक भौतिकवादी कह सकते हैं । जहां तक मे रा संबंध है मुझे जवतक खुद मह- सूस न हो कहना बेकार है । यहां तक कि मेरी चेतना भी भौतिक होनी चाहिए । मैं आस्था नहीं रखता/उतनी बिस्तीणं गहन आस्था/जितनी मेरी मा रखती थी । मा बहुत गहरे से आस्थावान होती है वह आपको पूजा करना सिखाती है । या फिर पिता के बारे में मेरी कविताओ को लीजिए जिनमे वह मानते है कि स्वर्ग जायेंगे/वह आस्यायान है भर वह अपने स्वर्ग को जायेंगे/मैं नहीं जाऊगा 1 क्राकोब में एक कंयलिक साप्ताहिक के संपादक से मेरी मुलाक़ात हुई। मैंने उनसे कहा अच्छा मेरा तो कोई जुगाड़ नही बैठ रहा होगा बैठ रहा है ? उन्होंने जवाब दिया अरे हम कवि लोगो के लिए कोई न कोई व्यवस्था करेंगे कोई शुद्धि-स्थल जैसी चीज़ बनायेंगे । एक दुसरे कंथलिक आलोचक ने तो आकार संग्रह मे रहस्यवाद और आधिभीतिकवाद की उपस्पिति तक खोज ली । मैं इससे सहमत नहीं हूं लेकिन आखिरकार हर आदमी की अपनी भूमिगत अव- चेतन की नदिया होती है । भूमिगत नदियों को बात करें तो भापकी ऐसी भी कविताएं हैं जो मुते रहस्यात्मक और यूढ़ लगती हैं। घास यथा हूंसी जैसी कविताएं 1 अस्पष्ट कविता जैसी । और मापकों सबसे ताज़ा कविता एक कविता की सतह पर भर उसके भीतर । आप बहुत साधारण कोई चीज़ चुनते हैं--एक दौचाल घास मोर्चा खाता हुआ एक पिजड़ा मेज पर रखे हुए बर्तन--और उनसे आप एक रहुस्यात्मकता की सुब्टि करते हूँ । बया वे उस तरीके ये नही रची गयी हैं जैसी देलवां दि चिरिको और माप्रिट भादि कुछ अतियथार्थवादी चिज्नकारो की कृतिया है ? वे भी पिजडों और ऐसी ही चीजों के चारो ओर अपनी संरचनाए तैयार करते हैं। हो सकता है. किसी देवी पक्षी ने मेरे साथ कोई चाल चली हो। सहसा वह चहचहा उठा हो तुम कितने शांत सीधे हो कितने स्वार्थी हर चीज़ को छूने के लिए मातुर । कविता नहीं सिर्फ़ तथ्य /




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