कला और संस्कृति | Kala Aura Sanskriti

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Kala Aura Sanskriti by श्री वासुदेवशरण अग्रवाल - Shri Vasudevsharan Agarwal

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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संस्कृति का स्वरूप प्र की रूटियों से ऊपर उठकर उसके नित्य श्रथें को ग्रहण करना चाहिए । आत्मा को प्रकाश से भर देनेवाली उसकी स्फूर्ति श्रौर प्रेरणा स्वीकार करके आ्रागे बढ़ना चाहिए; । जब कर्म की सिद्धि पर मनुष्य का ध्यान जाता है तब वह अनेक दोषों से बच जाता है । जब कर्म से भयभीत व्यक्ति केवल विचारों की उलभन में फैंस जाता है तब वह जीवन की किसी नई पद्धति या संस्कृति को जन्म नहीं दे पाता । तत्व आवश्यक हैं कि पूर्वकालीन संस्कृति के जो निर्माणुकारी तत्व है उन्हें लेकर हम कर्म में लगें और नई वस्तु का निर्माण करें । इसी .प्रकार भरूतकाल बतमान का खाद बनकर भविष्य के लिए, विशेष उपयोगी बनता हैं । भविष्य का विरोध करके पदे-पदे उससे जूफने में तर उसकी गति कुंठित करने में भूतकाल का जब उपयोग किया जाता है; तब नए, त्रौर पुराने के बीच एक खाई बन जाती है और समाज में दो प्रकार की विचारधाराएँ फौज कर संघर्ष को जन्म देती हैं । हमें श्रपने भूतकालीन सादित्य में ्रात्मत्याग श्र मानव-सेवा का आदर्श अहण करना होगा । श्पनी कला में से अध्यात्म भावों की प्रतिष्ठा और सौन्द्य-विघान . के -अनेक रूपों और त्रभिपायों को पुनः स्वीकार करना होगा । अपने दाशंनिक विचारों में से उस दृष्टिकोण को अपनाना होगा जो समन्वय, मेल-जोल, समवाय : और संप्रीति के जोवनमंत्र की शिक्षा देता है, जो विश्व के भावी सम्बन्धों का. एकमात्र नियामक दृष्टिकोण कहा जा सकता है । श्रपने उच्चाशयवाले धार्मिक सिद्धान्तों को मथकर उनका सार ग्रहण करना होंगा । धर्म का अर्थ सम्प्रदाय या मतविशेष का ग्रह नहीं है।. रूष्याँ .रुचिः्मेद से मिन्न होती रही हैं दौर होती रहेगीं,। घर्म का मथा हुद्रा सार है.प्रयत्नपूर्वक ्रपने श्रापको ऊँचा बनाना । - जीवन को उठाने- वाले जो नियम है वें जब -्रात्मा में बसने लगते हैं तभी धर्म का सच्चा आरम्भ मानना चाहिए; । साहित्य, कला दर्शन और धर्म से जो मूल्यवान सामग्री हमें मिलन सकती हैं उसे. नए; जीवन के लिए; ग्रहण -करना यही सांस्क्रतिक .कार्य की उचित दिशा और सच्ची उपयोगिता हैं. ।. .




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