कुशीनगर का इतिहास | Kushinagar Ka Itihas

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Kushinagar Ka Itihas by भिक्षु धर्मरक्षित - Bhikshu dharmrakshit

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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दे चारों महातीथों में यह प्रधान माना ज्ञाता था । चीन जापान जावा सुमात्रा --बर्मा लक्का फीजी तिब्बत नेपाल अरब ईरान और भारत के विभिन्‍न प्रदेशों के यात्री इस पुर्य-भूमि को अझपव उत्साह के साथ नाना कण्टकाकीणं मार्गों तथा नदी-नालों को लॉघचते हुए आया करते थे । इस तीथराज में अहत्‌ मिक्त-भिक्षशियों श्रौर उपासक-उपासिकाओओं ने जिस शान्ति- रस का सब्चचार किया था और अपने सच्चरित्र से सबको मुग्ध किया था वह बात संसार के धम-इतिहास में मलोभाँ ति विख्यात है। भारत के प्राचीन सोलह मद्दाजनपदों में मल्लजनपद अपना एक विशेष स्थान रखता था । इसकी प्रधान राजधानी यही कुशीनगर था । आनन्द स्थविर के पूर्वोक्त कथनाजुसार यह जान पढ़ता है कि कुशीनगर भारत के तत्कालीन मददानगरों में अपेच्ता- कृत छोटा था किन्वु गण॒तन्त्र राज्यों में इसका अपना एक विशिष्ट स्थान था । यही कारण था कि इस प्रदेश को भी कभी- कभी कुशीनारा के हो नाम से जाना जाता था जैन ्रन्थों के अनुसार जनपद पर भी कुशीनगर के मललों का श्भधिकार था । लिच्छवि श्र मल्ल दोनों का वह सम्मिलित गणुतन्त्र राज्य था । वष्जि जनपद के शासन-कायं के संचालन के लिये नव लिंच्छवि और नव मलल राजा होते थे । पश्चिम में शाक्य कोलिय पिप्पलिवन के शासक भी इनके प्रभुव्व से वंचित न थे । कुशीनगर का वीर बन्घुल मल्ल कोशलनरेश प्रसेनजित का प्रधान सेनापति ही था जिसने कि एक दी तीर से पाँच सौ जनक तर वकील जिला कार कक किन वि देव १ - मज्किम निकाय कथा ३ १ हे । २--निस्वावल्लियाश्रो प्रप्ठ २७ |.




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