पूर्व एशिया का आधुनिक इतिहास खंड 2 | Purv Asia Ka Adhunik Itihas Khand 2
श्रेणी : इतिहास / History

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Add Infomation About. Herald M. Vinake
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
17.52 MB
कुल पष्ठ :
360
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)८ पुव एशिया का आधुनिक. इतिहासइतने अधिक सदस्यों के होते हुए भी इनका 'राजनी तिक प्रभाव बहुत कम था । इसका
कारण एक तो यह था कि ये समित्तियाँ पुरानी सामंती विचारघारा से प्रभावित
थीं और दूसरा यह था कि दासन-तन्त्र के प्रति सम्मान का भाव पुर्वेवतू वने रहने
से वे असंतोष व्यक्त नहीं कर पाती थीं । किन्तु इन समितियों तथा श्रम संगठनों के
माध्यम से जितना असंतोष व्यक्त होने लगा था, उससे आनेवाले सामाजिक संकट
के संकेत स्पष्टतया मिलने लगे थे 1 जापान में नयी शक्तियाँ उत्पन्न हो रही थीं !(२) नेतृत्व सेना के हाथ मेंइस असंतोष का लाभ एक पुरानी शक्ति ने उठाया । वह पुरानी शक्ति थल-
सेना और कुछ भंश तक नौसेना थी 1-इन दोनों सेनाओं में एक लम्बे अर्से से क्रमदा
चोशु तथा संत्सुमा कुलों का प्रभाव था; विश्षेष कर चोशु कुछ का अत्यधिक प्रभाव
था । उन कुछों का नियंत्रण उच्च निदेशात्मक पदों पर एकाधिकार कर लेने के
कारण था ।। किन्तु प्रथम विश्वयुद्ध के पदचाव एक नया तत्त्व उभरकर शासन-तन्त्र
में अपने लिए प्रभावद्याली स्थान बनाने लगा । जैसे-जैसे मृत्यु या त्यागपत्र के कारण
पुराने नेताओं के स्थान रिक्त होने लगे, बेसे-वैसे उनका स्थान तब .तक दवे हुए
तत्त्वों ने लेना शुरू किया । ये तत्त्व मूलतः कम प्रभावकाली कुलों के थे । उनका
सम्बन्ध जापानी समाज में अपेक्षाकृत छोटे भ्रु-स्वासियों और निम्न मध्यवर्ग से था ।
१९२० भौर १९९२७ के बीच ३० प्रतिशत नये अधिकारी छोटे भु-स्वामियों, घनी
किसानों तथा शहरी क्षेत्रों के मध्यव्ग के परिवारों से आये थे और यह्द प्रतिद्यत
लगातार बढ़ता गया । ये जवान अधिकारी अपनी सामा जिक पुष्ठभुमि के कारण
पूुँजीवादी एकाधिकार का विरोध करने लगे । इसके साथ ही अपने व्यक्तिगत हितों
के कारण से वे सेना में पुराने रूढ़िवादी कुलों के जनरलों को चुनौती देने लगे |
इन जनरलों के स्थान पर पहले से 'ही वे लोग रखे जा रहे थे जो नये दृष्टिकोण से
सहाचुसुति रखते थे । १९३० तक मध्यसमूह के ये अधिकारी, जिनमें जनरल म्युठो
मराकी, मजाकी तथा हंयासी सस्मिलित थे, सर्वोच्च युद्ध-परिपद् का नियंत्रण प्राप्त
करने लगे । ”सामाजिक प्ृष्ठभुमि का प्रभाव इस कारण भी पुष्ट तथा रुढ़ होता गया कि
अनिवाय॑ भर्ती की. प्रणाली प्रचलित होने से उन वर्गों के युवक भी थल-सेना तथा
नौ-सेमा में भर्ती होने लगे जो आर्थिक दृष्टि से अत्यधिक पीड़ित थे । अतः प्रचार के
लिए अनुकूल अवसर देखकर उनके समक्ष सरकार भौर व्यापारियों के गठवबंबघन की
कड़ी आलोचना की जाने लगी तथा इस संबंध के कारण राजनीति में व्याप्त अष्टा-
चार पर वल दिया जाने लगा । इस अकार विभिन्न दलों तथा उनसे सम्बद्ध छोगोंके प्रति जो थोड़ा-बहुत सम्मान: दोप था वह भी कम होने लगा ।
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