महाभारत में धर्म | Maha Bharat Me Dhram

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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का महाभारत में धमेंमाना जाता है । स्वयं महाभारत में भी अनेक प्रकार से महाभारत की सहिसा का वर्णन वि.या गया है । परम्परा और महाभारत दोनों के प्रमाण के आधार पर महाभारत की महिमा का प्रतिपादन छुरा अध्याय में किया गया है । सहा- भारत के गायक सौति के शब्दों में महाभारत तीनों लोकों में महान ज्ञान के रूप में प्रतिष्ठित है । चह॒ सूर्य के रामान अज्ञान के अन्वकार को दूर करने वाला है । महाभारत सम्पुरों श्र. तियों का समूह है । एक स्थान पर उरो संपर्गग शास्त्रों और चारों वेदों से भी अधिक बताया गया है । उसमें धर्म, अर्थ और मोक्ष का परिपूर्ण वर्णन है । प्राचीन कथा के रूप में उसका ऐतिहारिक महत्व है। महाभारत साहित्य के अनेक ग्रन्थों का उपजीव्य बना है तथा उरावका काव्य सुन्दर है । धर्म और संस्कृति का तो वह चिस्वकोप ही है ।दूसरे अध्याय में महाभारत की आधुनिक आलोचना का परिचय दिया गया है । प्रस्तुत वोध-प्रबन्ध में महाभारत के धर्म-सम्चन्धी तत्वों का चिये- चंन सुख्यतः सूल महभारत के ही आधार पर किया गया है । किन्तु आधुनिक अध्ययन में ऐतिहासिक आलोचना का परिचय देना भी. अपेक्षित है । इसी दृष्टिकोण से धर्म के विविध पक्षों के विवेचन के पूर्व इस एक अध्याय में महाभारत की आधुनिक आलोचना का परिचय दिया गया है । यह परिचय विन्तरनित्स आदि के संस्कृत साहित्य के इतिहासों तथा या० सुकाथनकर के प्रथम भाषण के आधार पर दिया. गया है । महाभारत की ऐतिहासिक खोज का आरंभ पश्चिमी घिद्दानों ने किया । इन घिद्वानों में वौप, लासैन, सौरैनसन, हीप्किन्स, ओल्डनचगं, होल्त्समान, विन्तरनित्स आदि के नाम उल्लेखनीय हैं । महाभारत के भारतीय आलोचनों में प्रिन्सीपल थडानी, पंडित चिन्तामणि विनायक वैद्य, डा० सुकथनकर आदि के नाम स्मरणीय हैं । पश्चिमी विद्वानों के महाभारत सम्बन्धी मतों के साथ-साथ उक्त भारतीय घिद्वानों का गरिचय भी इस अध्याय में दिया. गया है । महाभारत की इस आधुनिक आलोचना का सम्बस्थ मुख्यतः उसकी रचना, काल, उसके लेखकों, उसके संस्करणों आदि से है ।तीसरे अध्याय में सहाभारत में धर्म के स्थान और महत्व का विस्तृत चिवेचन किया गया है । महाभारत के चतेमान रूप में धर्म-सम्बन्धी तत्व कथा भाग से कई गुना अधिक है । विषय तस्व की दृष्टि से भी यह धामिक




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