हिन्द पढ़ पियूष | Hind Padh Piyush

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Hind Padh Piyush by खजानचीराम जैन - Khajanchiram Jain

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भारतेन्दु लूँ सूसी उज्जैन श्ववध कन्नौन रहे बर। तह अब रोझत सिवा 'चहूँ दिशि लखियत खेंडहर। जहूँ धन विद्या बरसत रही सदा बे वादी ठहर। बरसत सब ही विधि बेबसी श्ब तो 'चेतो बीरवर । कहूँ गये विक्रस भोज रास बलि करें. युधिष्ठिर । चत्द्रयुप्त॒ चाणक्य कहाँ नासे करके थिर। कहें छन्नी सब सरे बितसि सब गये कितै गिर । कहाँ राज को तोौन साज जेहि जानत हे चिर। कहूँ दुर्ग सेन धन बल गयो, धूरहि धूर दिखात जग । उठि अजों न मेरे वत्सगन, रच्छहिं अपनों 'आाये संग ॥। गंगा-वणेन नव॒ इजल जलधार हार हीरक सी सोहति। बिच बिच छहरति बूँदू मध्य सुक्ता मनि पोहति ॥। लोल लह्दर लहि पवन एक पे इक इसि शावत 1 जिमि नर-गत सन दिदिध सनोरथ करत सिटावत ॥ सुभग स्वरों सोपान सरिस सब के सन भावत। द्रसन मज्न पान पत्रिदिघि भय दूर मिटावत ॥! श्रीदरि-पद-नख-च्द्रकान्त-सन-द्रवित सुधारस । पद कमण्डल सण्डन भवखण्डन सुरसरबवस ॥ शिघ्द सिर सालदि साल भगीरथ चूपति पुण्य फल । ऐरादत-गज-गिरि-पठि-हिस-तग-कणठह्ार कल ॥। सरर-सुबन सठ सहस परस जलमात्र उधारन। अगतित धारा. रूप. धारि. सागर. संचारन ॥। कासी कई प्रिय जानि ललकि सेस्यो अग धाई। सपने हू. नहिं तजी. रही. धंकस लपटाई ॥। हूँ बंधे नद-घाट उश् गिरिवर सम सोहत। षहें छदरी षहूँ सढ़ी दढ़ी सन सोहत जोहत ॥ पु




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