Ek Sapna by रागेय राघव - Ragey Raghav
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पुस्तक का साइज़ : 2.7 MB
कुल पृष्ठ : 139
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रागेय राघव - Ragey Raghav

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पहला घफ थीसियस श्दें नहीं जानती मेरा वह सकोच सुलभ नारी का भी किस श्रोर क्या हुभ्रा जो में यहाँ उपस्थिति में ऐसी प्रगत्भ हो व्यवत कर रही भाव हृदय के पर दयालु विनती करती हूँ एक चाह है मेरे भीतर यह वतलाये यदि में डेमेट्रियस न चुन व हे (ना करूं विवाह न उससे तो क्या है नियम यही है--या तो तुमको जाना होगा मृत्यु दप्ट्र मे या मानव समाज से बिल्कुल परित्यक्त हो टूर पड़ेगा रहना झ्रपना वाकी जीवन । सुघर हमिया इसीलिये श्रपनी तृष्णा से कर लो तक वितर्क सोच कर । श्रपने यौवन से तो प्रूछो श्रपती चपल वासना के उन्छ खल श्रावेशों को परखो यदि तुम श्रपने पूज्य पिता की श्रा्ञा का पालन. न. कर सकी तो वया साध्वी का कठोर जीवन सह लोगी ब्रह्मचारिणी का एकात न खा डालेगा तुमको वोलो चह झनत सुनापन उस नीरव जीवन का जिसमे नहीं ताप मिलता कोई रजन का ? दीन वासना हीन चद्रमा -._. उसे देखकर कव पक पीड़ित मत्र निभूत में वोल सकोगी ? उस सथम की मर्यादा गा पालन करने वालो को




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