जगजीवन साहब की बानी भाग १ | Jagjivan Sahab Ki baani Bhag Ii

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Book Image : जगजीवन साहब की बानी भाग १  - Jagjivan Sahab Ki baani  Bhag Ii
[adinserter block="2"]

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about अज्ञात - Unknown

Add Infomation AboutUnknown

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
बिरह शोर प्रेम का अंग पुमें बपुरा झजान का जानेँ, का कर सके बिचारी ।बहा जात श्पपंथ के मारग, तुम जानेहूँं हितकारो ॥२॥नेग जनम जग घस्यों श्ानि के, कबहूँ न सुद्धि संभारी ।गजब डरयेाँ भोजाल देखि के, लीजे रब की तारी ॥३॥ बरनत सेस सहस मुख ब्रह्मा, संकर लाये तारो ।माया बिदित ब्यापि रहि सब सह, निर्मल जोति तुम्हारी ॥४॥ गपरमपार पार को पावे, कहि कथि सब कोउ हारी ।जहूँ जस बास पास करि जानी, तह तेट्ठ सुररात सुधारी ॥४॥ भ्नगन पतित तारि एक छिन में, गनि नहिं जात पुकारी । जगजिंवनदास निरखि छछबि देख्यो, सीस चरन पर वारो ॥६॥॥ शब्द २ ॥सब की बार तार सोरे प्यारे। बिनती करि के कहूँ पुकारे ९॥ नहिं बसि शरहै केता कहि हारे। तुम्हरे झब सब बनहि सेँबारे २ तुम्टरे हाथ घ्है भब साईं । शोर दूसरों नाहीं कोई ॥ ३ ॥ जो तुम चहुत करत सो होईं । जल थल सह रहि जाति संमोईइं ॥ ४ ॥काहुक देत हो मंत्र सिखाई । से! भजि शंतर भक्ति ढृढ़ाई ४ कहे ते कछू कहा नहिं जाई । तुम ज्ानत तुम देत जनाईं ६ जगत भगत' केते तुम तारा । में श्जान केतान बिचारा ७खरन सीस में नाहाँ ठाराँ । नि्मेल सुरत निबान निहारेँ ८ जगजोवन काँ श्ब बिस्वास। राखहु सतगुरू ध्पपने पास ॥९॥




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now