जगजीवन साहब की बानी भाग १ | Jagjivan Sahab Ki baani Bhag Ii

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Jagjivan Sahab Ki baani  Bhag Ii by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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बिरह शोर प्रेम का अंग पु में बपुरा झजान का जानेँ, का कर सके बिचारी । बहा जात श्पपंथ के मारग, तुम जानेहूँं हितकारो ॥२॥ नेग जनम जग घस्यों श्ानि के, कबहूँ न सुद्धि संभारी । गजब डरयेाँ भोजाल देखि के, लीजे रब की तारी ॥३॥ बरनत सेस सहस मुख ब्रह्मा, संकर लाये तारो । माया बिदित ब्यापि रहि सब सह, निर्मल जोति तुम्हारी ॥४॥ गपरमपार पार को पावे, कहि कथि सब कोउ हारी । जहूँ जस बास पास करि जानी, तह तेट्ठ सुररात सुधारी ॥४॥ भ्नगन पतित तारि एक छिन में, गनि नहिं जात पुकारी । जगजिंवनदास निरखि छछबि देख्यो, सीस चरन पर वारो ॥६॥ ॥ शब्द २ ॥ सब की बार तार सोरे प्यारे। बिनती करि के कहूँ पुकारे ९॥ नहिं बसि शरहै केता कहि हारे। तुम्हरे झब सब बनहि सेँबारे २ तुम्टरे हाथ घ्है भब साईं । शोर दूसरों नाहीं कोई ॥ ३ ॥ जो तुम चहुत करत सो होईं । जल थल सह रहि जाति संमोईइं ॥ ४ ॥ काहुक देत हो मंत्र सिखाई । से! भजि शंतर भक्ति ढृढ़ाई ४ कहे ते कछू कहा नहिं जाई । तुम ज्ानत तुम देत जनाईं ६ जगत भगत' केते तुम तारा । में श्जान केतान बिचारा ७ खरन सीस में नाहाँ ठाराँ । नि्मेल सुरत निबान निहारेँ ८ जगजोवन काँ श्ब बिस्वास। राखहु सतगुरू ध्पपने पास ॥९॥




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