चरणदास जी की बानी | Charan Das Ji Ki Bani Bhag Ii

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Charan Das Ji Ki Bani Bhag Ii by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भेद बानी श्द्‌ उनमुनी श्र चित हेत करि बसि रहो देखि निज रूप मनुवाँ मिलायो ॥ ७ ॥ काल रु ज्वाल जग व्याधि सब मिरि गईं जीव सूँ हम गति बेगि पायो ॥ ८ ॥। चरनदास. रनजीत सुकदेव को दया सू अभय पद एरसि झवगति समायो ॥ £ ॥ शल्द २३ ॥ राग सारंग च विलावल व सोरठ ॥ साधो अजब नगर अधिकाई । झौघट घाद बाद जहूँ बाकी उस मारग हम जाई ॥ १ ॥। सबने बिना बहु बानी सुनिये बिन जिस्या स्वर गावें । बिना नेन जहूँ अचरज दीखे बिना अंग लिपदावे ॥ २ ॥ बिना नातिका बास पुष्प की बिना पाँव गिर चढ़िया । बिना हाथ जहेँ मिली धाय के बिन पाधा जहूँ पढ़िया ॥ है ॥। ऐसा घर बड़भागी पाया पहिरि गुरू का बाना । निस्वल है के दाता मारी मिटि गयो झावन जाना ॥ ४ ॥। गुरु सुकदेव करी जब किरपा झचुभो जुद्धि प्रकासी । चौथे पद में झयानंद यारी चरनदास जहूँ बासी ॥ ४ ॥ शब्द २४ ॥ राग सीठना ॥ टुक निगुंत छेज़ा सूँ, कि नेह लगाव री । जा को अजर अमर है देस, महल बेगमपुर री ॥ १ ॥ जहें सदा सोहागिन दोय, दिया सूँ भिलि रहुं री । जह आावा गवन न होय, मुक्ति चेरी तेरी ॥ २ ॥ ' कहें चरनदास शुरु मिले, सोई हाँ रहु वौरी । तन सुख सागर के बीच, कलहरी* है रहु री ॥ ३॥ (१) पहाड़ । (९) कल्वारिन |




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