शाहजहां नामा | Shahajahan Nama

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डॉ. रघुवीर सिंह - Dr Raghuveer Singh

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मनोहरसिंह राणावत - Manohar Singh Ranawat

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मुंशी देवीप्रसाद - Munshi Deviprasad

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रस्तावना 1 शाहजहां के राज्य-काल विषयक फारसी ऐतिहासिक श्राघार-ग्रथ मुगल साम्राज्य का स्वर्ण युग, शाहजट्टा का शासन-काल, समकालीन फारसी इतिहास-लेखन की दृष्टि से भी श्रतीव महत्त्वपूर्ण श्रीर स्वेथा समृद्ध रहा है। उस शासन-कालीन इतिहास विपयक शासकीय ही नहीं झशासकीय इतिहास-ग्रथ भी फारसी भाषा में भनेको लिखे गये थे, जिससे तत्सबंधी समकालीन शोर कुछ ही पश्चातूकालीन ऐतिहासिक झाधार-सामग्री बहुतायत से सुलभ है । श्रकबर-कालीन श्रवुल फजल की परपरा का ध्नुसरण कर समकालीन शासकीय इतिहास-लेखन का कार्य शाहूजह्दा के शासन-काल के प्रारंभ में ही तदर्थ नियुक्त मुशियों को सौंपा गया था । सन्‌ 1634 इं० (सन्‌ 1044 हि०) के लगभग मिर्जा जलालुद्दीन तवातवाई को भी तदथे उन्ददी में नियुक्त कर दिया गया । वह तब ही इस्फहान से भारत झाया था श्रौर फारसी-लेखन की नई कली मे वह दक्ष था । श्रत उसने तब एक 'पादशाह-नामा' लिखना प्रारभ किया, जिसकी प्रतिया श्रव सर्वेथा झप्राप्य हैं, उसके एकमात्र श्रव भी सुलभ श्रश की इनी-गिनी पतियों मे सौर गणना के भ्रनुसार नौरोज से प्रारंभ होने वाले शाहजद्दा के जुलूसी सन्‌ 5 के आदि (शनिवार, मार्चे 10, 1632 ई० ) से जुलूसी सन्‌ 8 के श्रत (बुधवार, मार्च 9, 1636 ई०) तक का ही विवरण है। इतना कुछ लिख जाने के वाद अपने प्रतिद्वन्द्यियो की ईर्ण्या से खेद-खिनन होकर तवातवाई ने तब भ्रपना यह 'पादशाह-नासा' लिखना बन्द कर दिया, शरीर यो चह इतिहास-प्रथ भपूर्ण हो रहा ।' उधर तब शासकीय इतिहास-विभाग के मुदियों के लेखन से शाहजहा 1 कम्बू, प्रामल-इनसालेहद, 3, पू० 435-436, जरनल भाफ रायल एशियाटिक सोसा- इटी, लदन, 1868, पू० 463 , स्टोरी, पशियन सिट्रेचर, खण्ड 1--विभाग 1, पू० 565- 366 । सुलभ प्रतिया--ब्रिंटिश म्यूजियम, लंदन, प्रथाक-भरियण्टल 1676 , शध्ासफिया लायब्रेरी, हैदरावाद, 1, क्रमाक 933 (पू० 359-360) ; #स्टेट लायब्रेरी, रामपुर ।




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