संस्कृत साहित्य एवं साहित्यकार - ४ | Sanskrit Sahitya Ev Sahityakar - 4

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Sanskrit Sahitya Ev Sahityakar - 4  by कस्तूरचंद कासलीवाल - Kasturchand Kasleeval

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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1089 प्रस्तुत भट्टारक ज्ञानमूषण पहिले भट्टारक विमलेन्द्रकीति के दिष्य थे और बाद में इन्होंने भट्टारक मुवनकीर्तिं को भी अपना गुरु स्वीकार कर छिया था। ज्ञानमूषण एव ज्ञानकीति थे दोनो ही सगे माई एव गुरु भाई थे और वे पूर्वी गोलालारे जाति के श्रावक थे। _ लेकिन सबत्‌ 1535 में सागवाडा एवं नोगाम में एक साथ दो प्रतिष्ठाए प्रारम्भ हुई । सागवाडा मे होने वाली प्रतिष्ठा के सचालक मट्टारक ज्ञानभूषण और नोगाम की. प्रतिष्ठा महोत्सव का सचालन ज्ञानकीर्ति ने किया । यही से भट्टारक ज्ञानभूषण चृहद्‌ शाखा के मट्टारक माने जाने लगे और भट्टारक ज्ञानकीर्ति लघु शाखा के गुर कहलाने लगे... ज एक नन्दि सघ की पट्टावली से ज्ञात होता है कि ये गुजरात के रहने वाले थे।. गुजरात मे ही उन्होने सागार-घर्म घारण किया अहीर (आभीर ) देश में ग्यारह प्रतिमाए घारण को और वाग्वर या वागड देश मे दु्घर महात्रत ग्रहण किये। तैलूव देश के यतियो मे इनकी बडी प्रतिष्ठा थी । तैलव देश के उत्तम पुरुषों ने उनके चरणों की वन्दना की द्रविड देश के विद्वानों ने उनका स्तवन किया महाराष्ट्र में उन्हें बहुत यश मिला सौराष्ट्र के घनी श्रावको ने उनके लिए महामहोत्सव किया ।. रायदेश (ईडर के आस-पास का प्रान्त) के निवासियों ने उनके वचनो को अतिशय प्रमाण माना मेरूमाट (मेवाड ) के मूखे लोगो को उन्होंने प्रतिवोधित किया मालवा के भव्यजनों के हृदय-कमल को विकसित किया मेवात मे उनके अध्यात्म-रहस्यपुण व्याख्यान से विविध विद्वान श्रावक प्रसन्न हुए ।. कुरुआागछ के लोगो का अज्ञान रोग टूर किया बैराठ (जयपुर के आस-पास) के लोगो को उभय मार्ग (सागार अनगार) दिखलाये नमियाड (नीमाड) में जैन घर्म की प्रमावना की । सैरव राजा ने उनकी भक्ति की इन्द्रराज ने चरण पूजे राजाधघिराज देवराज ने चरणों की आराधना की । जिन धर्म के आराघक मुदलियार रामनाथराय वोम्मरसराय कलपराय पाडुराय आदि राजाओ ने पूजा की और उन्होने अनेक तीर्थों की यात्रा की । व्याकरण-छन्द-अलकार-साहित्य-तर्क-आगम-आध्यात्म आदि शास्त्र रूपी कमलो पर विहार करने के लिए वे राजहस थे और शुद्ध ध्यानामृत-पान की उन्हें लालसा थी ।2 ये उक्त विवरण कुछ अतिशयोक्तिपूर्ण भी हो सकता है लेकिन इतना अवश्य है कि ज्ञानमूषण अपने समय के प्रसिद्ध सन्त थे और उन्होने अपने त्याग एव विद्वत्ता से सभी को मुग्ब कर रखा था । ज्ञानमूषण भट्टारक मुवनकीति के पश्चात सागवाडा में मट्टारक गादी पर बैठे। अब तक सबसे प्राचीन उल्लेख सवत्‌_ 1531 बैशाख सुदी 2 का मिलता है जब कि इन्होने डू गरपुर मे आयोजित प्रतिष्ठा महोत्सव का सचालन किया था ।. उस समय डू गरपुर पर रावल सोमदास एव रानी गुराई का शासन था । ज्ञानमूषण मट्टारक गादी पर सबतु 1531 से 1557-58 तक रहे । सवत्‌ 1560 में उन्होने तत्वज्ञान तरगिणी की रचना समाप्त की थी इसको पुष्पिका में इन्होने अपने नाम के पूर्व मुमुक्षु शब्द जोडा है जो अन्य रचनाओ में नही सिलता । इससे ज्ञात होता ह कि इसी वर्ष अथवा इससे पूर्व ही इन्होने मट्टारक पद छोड दिया था । साहित्य साघना ज्ञानमूपण मटूटारक बनने से पुर्व और इस पद को छोडने के परचात्‌ भी साहित्य-साघना में लगे रहे । वे जबरदस्त साहित्य सेवो थे । प्राकृत सस्कृत हिन्दी युजराती एव राजस्थानी भर 1. देखिये भट्टारक पट्टावलि शास्त्भण्डार म. यश. कीर्ति दि. जैन सरस्वती भवन ऋषभदेव (राजस्थान) 2. देखिये प नाथुरामजी प्रेमी कृत जैन साहित्य और इतिहास पृ. 38-82 3. सबतु 15371 वर्ष वैसाख वुदी 5 बुध श्री मूलसघे भ श्री सकलकीतिस्तत्पट्टे म भुवनकीति देवास्तत्पट्टे म. श्री ज्ञानमूषणस्तदुपदेशात्‌ सेघा भार्या टी. प्रणमति श्री गिरिपुर रावल श्री सोमदास राजी गुराई सुराज्यें ।




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