मंगलमन्त्र णमोकार : एक अनुचिंतन | Mangal Mantra Namokar : Ak Anuchintan

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Mangal Mantra Namokar : Ak Anuchintan by अयोध्याप्रसाद गोयलीय - Ayodhyaprasad Goyaliya

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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मज्गलमन्त्र णमोकार : एक झनुचिन्तन १६. सापेक्षव्वनि चाहक, सहयोग या सयोग द्वारा विलक्षण कार्य साधक, आत्मों- ्तिसे शूत्य, रुद्रवीजेंका जनक, भयंकर श्र बीभत्स कार्योके लिए, भी प्रयुक्त दोनेपर कार्य साधक । स--स्व समीहित साभक, सभी प्रकारके बीजोमे प्रयोग योग्य, शान्तिके लिए. परम आवश्यक, पोष्टिक कार्योके लिए परम उपयोगी, जानावारणीय- दर्शनावरणीय द्रादि कार्योका विनाशक, क्लींवीजका सहयोगी, कामत्रीजका उत्पादक, श्रात्मसूचक तर दर्शक । हृन्-शान्ति, पौष्टिक श्रौर माज्जलिक कार्योका उत्पादक, साघनाके लिए; परमोपयोगी, स्वतन्त्र श्रौर सहयोगापेक्षी, लकच्ष्मीकी उत्पत्तिमे साधक, सन्तान पात्तिके लिए, श्नुस्वार युक्त होनेपर जाप्यस सहायक, श्राकाशमे तत्त्व युक्त, कर्मनाशक, सभी प्रकारके बीजोका जनक । उपर्युक्त व्वनियोके विश्लेषणसे स्पष्ट है कि मातूका मन्त्र ध्वनियोकि स्वर श्र व्यन्जनेकि सयोगसे ही समस्त बीजाक्रोंकी उत्पत्ति हुई है तथा इन मातृका ध्वनियोकी शक्ति ही मन्त्रोपें आती है । णमोकार मन्त्रसे ही मातृका '्वनियों निःसत हैं। अतः समस्त मन्न्शास्र इसी महामन्त्रसे प्रादुर्भूत हैं । इस विपयपर अनुचिन्तनसै विस्तारपूर्वक विचार किया गया है । यतः यद्द युग विचार श्र तर्क का है, मात्र भावनासे किसी भी बातकी सिद्धि नहीं मानी जा सकती है । भावनाका प्रादुर्मभाव भी तक श्र विचार द्वारा श्रद्धा उत्पन्न होनेपर होता है। श्रतः णमोकार महामन्त्रपर श्रद्धा उत्पन्न करनेके लिए, उक्त विचार श्रावश्यक है । दार्शनिक इृष्टिसि इस मन्न्रकी सोरव-गरिमाका विवेचन भी अनुचिन्तन में किया बा चुका है | च्िन्तनकी झपनी टिशा है, वह कहाँ तक सही है, यह तो विचारशील पाठक ही श्रवगत कर सकेंगे । इस अनुचिन्तनके लिखनेमे कई प्राचीन तर नवीन श्रात्वार्योकी र्चनाओका मैंने उपयोग किया है, ता मैं उन सभी आाचार्यों श्र लेखकोका आ्ाभारी हूँ । श्री जैनसिद्धान्त-




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