वैदिक सिद्धान्त सम्पन्न | Vedic Siddhanta Sampann

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Vedic Siddhanta Sampann by नाथूराम शंकर शर्मा - Nathuram Shankar Sharmaहरिशंकर शर्मा - Harishanker Sharma

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नाथूराम शंकर शर्मा - Nathuram Shankar Sharma

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हरिशंकर शर्मा - Harishanker Sharma

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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ननरससनटपनपटटटटनय | र्‌ [.₹ |] व पलपल जा हा तारा ला ध्ा्भाध्भत्धाभाधाााशाशााशाएएल्‍ुएएंटा, पभने अतुकूल काल फेरा । चमके अनुरागरत्त मेरा ॥१४॥ त्तनदश्य जरा अशक्ति का है । घन भाजन जाति भक्ति का है ॥। धनराशि न पास दास को है । सदुभापण मात्र मान को है ॥ यश उज्ज्वलका उधार घरा । चुपके शनुरागरत्त मेरा ॥१५॥। ! झनुभूत विवेक यंत्र ढाला-। मथ सत्यसमुद्र को निकाला ॥। ' घर चण सुवणे में .जड़ा है । हित के हिय हार में पढ़ा है ॥ चतलाये-न लाख का लखेरा । पमके झनुरागरत्त पमंरा ॥१६॥। सगवती-सारती' ( सारठा ) जिसके आननचार; उत्तम $अन्त!करण हैं । दुद्दिता परमोदार; उस#विरज्चिकी भारती ॥९॥ ं | न सरस्वतीकी सहावीरता (४) +( सुजड़म्रयात )+ -महावीरता भारती धारती है । प्रमादी मह्ामोछकों मारती हट ॥ बड़ोंफे बड़े कासकी है लड़ाई । सिलीश्री/सिली है, सिलेगीवड़ाइ ॥१॥ न भारती न सरस्वती ” घायसुदेवता ” जीव की चंद शाक्त ।जस क द्वारा सपने विचारों फो दूसरा पर प्रकट फरता दे मार शात्मशता पूनक घ्रह्मफा च्याख्याता घनता द $ उप्तम झन्तः: फरर न सत्यसस्पसमन १, ानाचशिएायुस्ध २५ योगयुक्त ।वित्त २. पात्मप्रति्ठापूशा झद्देकार ४7 % विराब्चि न चह्मा मात जीवात्मा ”




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