गुलाबकुंवरी भाग 1 | Gulabkunvri Bhag 1

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Gulabkunvri Bhag 1  by बाबू रामलाल वर्मा - Babu Ramlal Verma

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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*# पहला भाग २ श्ट्े : महाराज कौन ? 2: है नकावपोश,- ( नेकाव पीछे उछट कर ) “ में हूं महाराज दा भत |]: हद दूनथ बदन * ्‌ महाराज- अहा ! दारोग़ “ पुतलीमइर ! * तुम ओगये, ' कुशल. तो है ”. चन्द्रसिंद को ठिकाने पहुंचा दिया ? * 7 दारोग़रा- महाराज के पुण्य परतापसे सब कुशठ हे, कुंवर :चन्द्रसिइ आज शाम को ने० ७ वाली गुफासे ” पुतलीमदइलू ” में केद कर. लिय गये हैं और उनका ऐय्यार दीरासिंद भी “ मायाकूप मूं ” कदकर स्वयं ” पुतरीमहल ” में आ फँसा दे । मगर कुंचर- चन्द्रसिद को स० ९५ की कोठरीमें वन्द करतेदी मेरे क्र एक घड़ाकेकी -आवाज हुई. और साथद्दी कमरा दिलने छगां कुछ देर वाद..एकाएक उसकी पूरव ओर की दीवार एक गड़गड़ाइटकी -आवाज़क साथ वाचत फट गई 1 उसके अन्दर एक बड़ा आछ- मारी दिखाई दी, देखते. देखते उस आछकमारीके दोनो दरवाज़े घड़से खर. गये ! साथ ही. उसमें से दो खूबमरत, परतखियाँ ७ निकल कर चड़ाद। सुराछा आवाज़ में शोकजनक गीत गाने लगा ! जिते मैं विछकुछ न. समझ. सका मगर . उनकी आकृतिसे इतना मुझे ज़रूर माठ़म हुआ, कि वह अपने गीतोंपिं शोक प्रगट कर रही शा ६, थीं। करीब ९० पिनट तक वह गाती रहीं। फिर एकाएक उछछ कर - दोनो पुतढियाँ आछपारी में घुस गई ! एकने अपने मुदसे एक भा # जपन्नका. लिपटा हुआ टुकड़ा निकर 'कर वाइर फेंक दिया! आछं- मारीकें दोनों :-दरवाज़े - घड़े से वन्द हो : गयें फटी हुई दीवार ज्यों की तपों जुट गई ! मैं एक दम स्रप्नावस्थाकी तरह भोचकसा'- करसी पर दैठा:रह गया । मेरी जिर्दर्गीमें ऐसा कभी नहीं हुआ था करीब आध घण्टे तक में उसी अवस्थामें वेठा रहा । : फिर क्रमशां: >




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