मनुष्य शरीर की श्रेष्ठता | Manushya Sharir Ki Shreshthata

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Book Image : मनुष्य शरीर की श्रेष्ठता  - Manushya Sharir Ki Shreshthata
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( हरे )श्रष्तित गिरि समस्यात्‌ फज्जलं सिन्धु पात्रे सुरतरू चर शासा लेयनी पत्र सुर्व्वी । लिसति यदि यृदीत्या शारदा सर्व काले, तद॒पिं तय गुणाना मीश पार ने याति ॥|यदद तो हुआ प्रकृति देवी का शुण गान | आइये अब इस सय लोग टैत्य देवता मिलकर समुद्र सथें 'और झपनी फरुपना रूपी मथानी द्वारा सबसे पदले उन घड़े-्वड़े पीछे-पीले सपंजों में से; जो कि समुद्र की तह में दपादप चमक रहे हैं किसी एक को निकालें 'और उसके दर एक भाग का भली माँ ति निरीक्षण करें । तव तो ज्ञात दो जायगा कि यद्द एक जालीदार वस्तु है जो कि एक लसदार पदाथ से ढकी हुई है। परन्तु दमारा आपका निरीक्षण ठीक नहीं; क्योंकि चास्तव में लसदार पदार्थ दी यथार्थ स्पज है । और जिसे इम लोग स्प समसे बैठे हैं व तो केवल इसका मात्र है।प्राणी वगे में यदद॒स्पज सबसे श्लुद्र जीव है । इसमे फेवल एक दी प्रकार का पदाथे है । और इसकी धनावट क्या पिद्दी क्या पिद्दी का शोरवा--नाम मात्र के दी लिये है। परन्तु फिर भी भाप इसे जड पदाथ नहीं कद सकते । यदद खाता है; सॉँघर लेता है, अनुभव करता है 'और मूल रूप मे चेतन पदार्थ के सभी लक्षण दिखलाता है ।अगर मलन्ुप्य शरीर के गत इतिहास का पता लगाया जाय और इसके प्रारम्भिक भर्तित्व का अन्वेपण किया जाय तो




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