जयशंकर प्रसाद वस्तु और कला | Jaishankar Prasad - Vastu Aur Kala

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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हा को श्रम व निष्ठा के साथ सभालते हुए मुझे पर्याप्त निश्चित रखा है इसके लिए वे मेरे हार्दिक धन्यवाद के पात्र हैं । नेशनल पब्लिशिग हाउस दिल्‍ली के स्वामी श्री कन्हैंयालाल मलिक ने जिन्होंने छह-सात वर्ष पूर्व ही मुझे इस रथ के मुद्रण का दायित्व देने के लिए प्रतिश्रुत कर लिया था अपने प्रकाशन-सस्थान के गौरव व प्रतिष्ठा के अनुरूप ही इस प्रबध को सुरुचि व लगन ही करने में अपना उत्साह प्रदर्शित किया है इसके लिए वे मेरी हार्दिक प्रशसा के पात्र हैं । प्रसाद-साहित्य का समग्र वे सश्लिष्ट अध्ययन अत्यत कठिन व गुरुतर कार्य प्रमाणित हुआ । पर मैने अपनी शक्ति व मति के अनुरूप इसे करने का पूर्ण प्रयास किया है । फिर भी मेरी धारणाओं व मान्यताओं में न्यूनाधिक असतुलन रह गया हो और जान-अनजान मे प्रमाद हो गया हो तो इसके लिए मे परिष्करणीय हू । पाठकगण प्रबंध की उपलब्धि उसके अगों व अशों में उतनी नही उसके आशय व समग्रता में ही कही दूढने की कृपा करें । प्रबंध की उपलब्धि के सबध मे अपनी ओर से मेरा किसी भी प्रकार का कोई लबा-चौडा दावा नही है। है तो केवल यही कि मैंने अपने अधिगत सभी लघु-हस्व साधनों के बल से प्रसाद को उनको मूल वास्तविकता मे समझने का पूर्ण निष्ठामय प्रयास किया है । हा यह भी न छिपाऊगा कि मेरे काम्य आदर्श को देखते हुए इस कार्य से मुझे स्वय को अब भी पूरा सतोष नही है । अभी कुछ और शेष । इस प्रबंध के निर्माण मे मेरी सहधर्मिणी सौभाग्यवती कान्तिबाला ने अपने दो बडे ऑपरेशनो के बावजूद गृहस्थी की झझटों व पल-पल की पाव- ककरियो से मुझे अधिकाधिक मुक्त रखकर एकाग्रता के साथ कार्यरत रखने में जो मोन व कठोर साधना की है उसका बखान करके मै उस तप के सौंदर्य को विकृत नहीं करना चाहता । अत मे निवेदन है कि यदि विद्वज्जन शोधार्थी व प्रेमी पाठक इस प्रबंध की तरुटियों असगतियों व अभावो की ओर मेरा ध्यान आकृष्ठ करने की कृपा करेगे तो में उनका आभारी होऊगा और उनके रचनात्मक सुझावो से आभारपूर्वक लाभ उठाता हुआ अरथ के द्वितीय सस्करण को यथासभव समृद्ध बनाने का प्रयल करूंगा । ग्रथ के अत में परिशिष्ट 6 व प्रश्नोत्तरी में आचार्य वाजपेयी जी के उत्तरों का प्रस्तुतीकरण उनकी लिखितर स्वीकृति के आधार पर किया गया है। यदि इस प्रबंध से साहित्य को विशेषत प्रसाद-साहित्य को कुछ भी योगदान हुआ तो दीर्घकाल का मेरा यह कठोर श्रम व्यर्थ नही जायेगा । प्रोफेसर तथा अध्यक्ष हिंदी विभाग -रामेश्वरलाल खण्डेलवाल तथा डीन कला-सकाय सरदार पटेल यूनिवर्सिटी वबल्लभ विद्यानगर गुजरात अप्रैल 1968




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