बापू - कथा | Bapu - Katha

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Bapu - Katha by हरिभाऊ उपाध्याय - Haribhau Upadhyaya
लेखक :
पुस्तक का साइज़ : 6.98 MB
कुल पृष्ठ : 244
श्रेणी :
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हरिभाऊ उपाध्याय - Haribhau Upadhyaya

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1 १. नया नेतूतंबुं नया युग न शय न (१९१६). ५५ तम्सवामि युगे युगे । -गीता व ( मैं युग-युगमे आता हूँ ) शलषणे क्षणे यन्वतामुर्पति । ( जो हर क्षणमे नवीनता प्राप्त करता है। ) आमतौरपर माना जाता है कि नागपुर-काग्रेससे भारतके इतिहासमे एक नया युग शुरू हुआ । परन्तु यह ऊपरसे दीख़नेकी वात है। वास्तवमे तो नये यूगकी शुरुआत की दिन गाघीजीने इस देशक्रे साव॑जविक जीवनमे प्रवेश किया तमीसे गयी थी । हे इस क्षेत्र वापूके कदम रखते ही मारतमे मनुष्यका सारा जीवन-दर्शन ही बदल गया । सम्यताकी नयी परिमादा पैदा हो गयी । सावंजनिक सेवा और नेतृत्वका तरीका वदल गया और परिचमी सम्यताकों जहाँ आदर्श माना जाता था वहाँ उसकी मिथ्या प्रतिष्ठाकी कलई खुल गयी और भारतीयताको आदरकी दृष्टिसि देखा जाने लगा। .. शग्रेजी बोलना मतिप्ठाकी वात मानी जाती थी । पढ़ें-छिल्ले छोग अपनी मातृ- माषामे पत्र लिखनेके वजाय घरके लोगोको भी अग्रेजीमे ही पत्र लिखनेमे गोरव और घन्यता मानते थे । गाधीजीने इस सारे कमको एकदम बदल दिया । विदेश-याश्नापर जो लोग जाते वे पुरे विदेशी वनकर स्वदेश लौटते थे । गाधीजीने ठीक इससे उलटा किया । वे जहाजते उतरे तो अपने स्वदेगी--उ5 काठियावाडी--लिवासभे । वम्बईमे और जहाँ-जहाँ मी उनका स्वागत हुआ उमका उत्तर उन्होंने गुजराती या. हिन्दीमें दिया । विदेश-यात्राको समाज पाय मानता था । अत समाजकी नही पिता-समान वडे माईकी आज्ञा मानकर नासिकने जाकर अपनी शुद्धि मी कर ली । यो समाजसे तो आजन्म वाहर हो रहे । न््ऐटेन




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