दंडी दम्भ दर्पण | Dandi Dambh Darpan

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Dandi Dambh Darpan by आचार्य विनयचन्द्र - AacharyaVinaychandra
लेखक :
पुस्तक का साइज़ : 2.45 MB
कुल पृष्ठ : 140
श्रेणी :
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आचार्य विनयचन्द्र - AacharyaVinaychandra

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(९) काव्य के तीसरे चरस मे लूँ लिखता है कि अंदर का मु खुला करके ऊपर पाटा छाया है उत्तरः-रे दुंभी दूंडी सब्ननों के तो एकह्दी मुख होता हे जिसका जिनोक्त मय्यीदा से यत्न रखते हैं और दे। मुखती दुल्ेनेंकि होते हैं. अथवा तुझ दूडी के दोमुख होंगि ?? तीसरे कान्य के प्रथम चरण मै तँनें लिखा दे कि गग्गा-गुदा मृत से धोवे पानी से डर आया है उत्तर -रे दूंडी उक्त लेख तेरा नितान्त दंभ का है और उक्त लेखकों लिखकर तूँ ने पुणे अभ्याक्ख्यान रूप पाप की पोट शिरपर धारण की है तू इस पाप के भार से धरा तल में लहं घधसकि जाय ? कारण कि पापिओं की अधोगती ही होती है. हम इस बातको दावे से कहते हैं कि कोई भी सना- तन जैन मुनि गुदा को पानीसे डरकर मूत्र से नहिं धोते. और नहीं पूँछने पर झूँठ वात बतलाते और नहीं मूत्र का नाम नो पानी ही वर छोडा है यह वार्ता तेरी सबैथा मिथ्या है यदि सत्य है तो प्रमाण दे कर सिद्ध कर कि किस सुसाघु ने ते तुझ को पूँछने पर झँँठ वात बतलाई अरु किस सुसाघु ने तुझे मून्रका लास नोपानी वबतढाया है. अरु किसके सामने बतलाया ? यह तो अवश्य है कि तुम्हारे दी पूज्यपाद्‌ आचार्य्यो ने मूत्र का नाम अणाद्दार रख छोडा दै देखो प्रकरण माठा ? की प्रष्ठ ८४ की पंक्ति दूसरी ५ उक्त चार्तों को जब तक तू किसी सुसाघु के ठेख से सिद्ध न करेगा तब तक मद्दायषावादी समझा जायगा




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